Materialism – Resolution centric (समाधानात्मक भौतिकवाद)

 
[* Original article in Hindi by A Nagraj]

Materialism, – samadhanatmak bhoutikvad (समाधानात्मक भौतिकवाद) |

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  • which discusses ‘physiochemical material reality’ in the form of ‘resolution-centric materialism’.  Discusses the issues in materialism to date and how these get resolved. Maps to darsana of human action which provide its basis.
  • Contents:
    • Resolution and Conflict. History of Mankind. Existence and the development of atom in existence. 5 kinds of Humans in the knowledge-order. Four natural-orders in nature. Orderliness in Existence = Coexistence. Coexistence, Complementariness & Orderliness.
    • Cognition, Consciousness and Conscious. Society, Religion (Dharma, Orderliness) & State. Human Food. Essence of the Human. Inter-relationship between Religion & State. Properties, Effect & Potential. Industry, Requirement, Relationship & Balance. Fear-Enticement or Value-Evaluation.

समाधानात्मक भौतिकवाद का प्रयोजन

 

शिक्षा में अथवा शिक्षा विधि में जीवन ज्ञान, सहअस्तित्व दर्शनज्ञान सम्पन्न शिक्षा रहेगी ही। इसे पाने के लिए समाधानात्मक भैतिकवाद का अध्ययन कराया जाता है। जिससे संपूर्ण भौतिकता रसायन तंत्र में व्यक्त होते हुए संयुक्त रूप में विकास क्रम को सुस्पष्ट किये जाने का तौर तरीका और पूरकता रूपी प्रयोजनो का बोध कराया जाता है। समाधानात्मक भौतिकवाद परमाणु में विकास, परमाणु में प्रजातियां होने का अध्ययन पूरा कराता है। परमाणु विकसित होकर जीवन पद में संक्रमित होता है दूसरी भाषा में विकसित परमाणु ही जीवन है।

 

हर भौतिक परमाणु में श्रम, गति, परिणाम का होना समझ में आता है। जबकि गठनपूर्ण परमाणु (चैतन्य इकाई) परिणाम प्रवृति से मुक्त होता है। दूसरी भाषा में जीवन परमाणु परिणाम के अमरत्व पद में होना पाया जाता है। अमरत्व की परिकल्पना प्राचीन काल से ही देवताओं को अमर, आत्मा को अमर कहना यह आदर्शवाद है। यह मन में रहते आयी है। इसे चिन्हित रूप में सार्थकता के अर्थ में अध्ययन करना कराना संभव नहीं हुआ था। सहअस्तित्व विधि से यह संभव हो गया।

 

इस क्रम में जीवन के सम्पूर्ण क्रियाकलापो जैसे जीवन में जागृति, जागृति क्रम में जाग्रति एवं जीवन का अमस्व का अध्ययन भली प्रकार से हो पाता है। जागृति में समाधान का उदय होने पर समाधानात्मक भौतिकवाद की सार्थकता समझ में आती है। भौतिकवाद को संघर्ष का आधार माना जाये या समाधान का। इस पर संवाद एक अ’छा कार्यक्रम है।

 

समाधानात्मक भौतिकवाद –  मूल अवधारणाएं

* स्त्रोत = संस १९९८ 

  • द्वन्द्व व ‘‘संघर्ष’’ के स्थान पर ‘‘समाधान’’ के रूप में यह ‘‘समाधानात्मक भौतिकवाद’’ प्रबंध के रूप में प्रस्तुत है।
  • शास्त्र रूपी पुस्तक और यंत्र प्रमाण के स्थान पर ‘‘जागृत मानव ही प्रमाण का आधार’’ होना – यह प्रतिपादित है।
  • भक्ति-विरक्ति, एकान्त, संग्रह, सुविधा और भोगवाद के स्थान पर सह-अस्तित्ववाद और व्यवस्था में समाधान, समृद्धि, अभय (वर्तमान में विश्वास) इंगित होने के अर्थ में यह प्रस्तुत है।
  • विचार में समाधान, अनुभव में प्रमाण के रूप में प्रस्तुत है।
  • ‘‘ब्रह्मï सत्य, जगत् मिथ्या’’ के स्थान पर ‘‘ब्रह्मï सत्य, जगत शाश्वत्’’ होने के प्रतिपादन के रूप में प्रस्तुत है।
  • रहस्यमूलक, आदर्शवादी चिंतन और अस्थिरता, अनिश्चयता मूलक, वस्तु केन्द्रित भौतिकवादी विचार के विकल्प के रूप में यह अस्तित्वमूलक, मानव केन्द्रित सह-अस्तित्ववादी चिंतन प्रस्तुत है।

 

प्राक्कथन

यह मूल प्रबंध रूपी पुस्तक ‘‘समाधानात्मक भौतिकवाद’’ सहज नाम से प्रस्तुत है। यह अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व रूपी तथ्यों की अभिव्यक्ति है और मानव सहज ज्ञान विवेक व विज्ञान सम्मत तर्क संगत है। वाद का अर्थ भी यही है – एक संवाद। संवाद का मतलब है प्रयोजनों के अर्थ में तर्क। मानव अपने में पूर्णता के अर्थ में किये गए वार्तालाप का संवाद, वाद, तर्क करता है और मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ निरीक्षण, परीक्षण, सर्वेक्षणपूर्वक विश्लेषण करता है। इसी क्रम में, यह वांङ्गïमय, मानव कुल के सम्मुख प्रस्तुत हुआ।

मानव कुल, सुदूर विगत से ही, दर्शन विचार (वाद) और शास्त्र विधाओं में अपने को संप्रेषित करने का प्रयास करते आया है। इसी क्रम में प्रस्तुति स्वरूप एक प्रमाण है। इस प्रस्तुति के नामकरण से संबंधित स्वीकृतियाँ मानव सहज है। इसीलिए यह सार्वभौम है। यह भी देखा गया कि मानसिक रूप में स्वीकृतियाँ होते हुए भी जिम्मेदारी के साथ व्यवहार में प्रमाणित होने में अवश्य ही परम्परा से भिन्नता होना पाया गया। जैसा इसका शीर्ष है। पहले से हम ‘द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद’ से परिचित हैं। उसकी स्वीकृति अर्थात् द्वन्द्व के अर्थ में मानव को संघर्ष समझ में आता है। उसको सदा-सदा के लिए मानव कुल ने स्वीकारा नहीं।

जबकि परंपरा में अपेक्षा के रूप में समाधान समाया हुआ देखा जाता है, जैसा – मेधावियों के सम्मुख द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद, विज्ञान शिक्षा के आधार रूप में प्रस्तुत हुआ है। इसका प्रमाण है कि सारा विज्ञान सूत्र द्वन्द्ववादी है ही। विज्ञान सूत्र का प्रमाण यंत्र होने के आधार पर शिक्षा परम्परा इसका धारक-वाहक है। इसी के आधार पर अर्थात् ‘द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद’ के आधार पर ही ‘कामोन्मादी मनोविज्ञान’ सर्जित होना देखा गया। ऐसे मनोविज्ञान के आधार पर ही हम मानव ‘भोगोन्मादी समाजशास्त्र’ और ‘लाभोन्मादी अर्थशास्त्र’ को शिक्षा परंपरा में स्वीकार लिए। इसी द्वन्द्ववादी जंगल में मूल्य, चरित्र, नैतिकता को खोजे जा रहे हैं। अभी तक यह किसी देश, काल में प्रमाणित नहीं हो पाया है। इन्हीं प्रश्नों के उत्तर या समाधान रूप में जो सह-अस्तित्व सहज नियम, प्रक्रिया और फलन है, इसी के यथावत संप्रेषित करने के क्रम में इस पुस्तक को प्रस्तुत किया है।

‘समाधानात्मक भौतिकवाद’ मूलत: व्यवस्था केन्द्रित  अभिव्यक्ति, संप्रेषणा है। यह अस्तित्व में पाए जाने वाले मनुष्येत्तर संपूर्ण प्रकृति का अध्ययन सहज निश्चय के आधार पर निर्भर है। इस प्रस्तुति के पहले अस्तित्व सहज वैभव को समझना एक आïवश्यकता रही है, इसकी आपूर्ति सहज संभव हो गई।

समाधान हर मानव में स्वीकृत है। इसे और भी विधि से कहा जाय तो सर्वतोमुखी समाधान सर्वमानव में स्वीकृत है। मनुष्येत्तर प्रकृति में आचरण प्रमाणित है ही। इसका नीति सूत्र है – ‘‘अस्तित्व में प्रत्येक एक अपने ‘त्व’ सहित व्यवस्था में कार्यरत और समग्र व्यवस्था में भागीदारी सम्पन्न है।’’ इस क्रम में मिट्टी, पत्थर, मणि, धातु, परमाणु, अणु, अणु रचित संपूर्ण पिंडों, किसी पिण्ड की सतह में पाए जाने वाले वनस्पति संसार, जीव संसार, इसी सूत्र व्याख्या में प्रमाणित होते हैं। मानव में प्रमाणित होना शेष है। इसे अध्ययनगम्य कराने के लिए ‘समाधानात्मक भौतिकवाद’ है।

मानव में समाधान प्रमाणित होने की संभावना है। मानव तभी समझदार हो पाता है, जब अस्तित्व, जीवन और मानवीयता पूर्ण आचरण अच्छे से समझ में आ जाय। यह आएगा कहां से? मानव से ही, मानव के लिए सुलभ होना नित्य सहज है। इस विधि से यह प्रस्तुत हुआ है।

समाधान का तात्पर्य क्यों और कैसे के उत्तर के रूप में है। मानव व्यवहार में संपूर्ण समाधान, नियम, नियंत्रण, संतुलन, न्याय और धर्म (सार्वभौम व्यवस्था) के रूप में परम सत्य रूपी सह-अस्तित्व ही होना पाया गया है। यह नित्य समीचीन है। समीचीनता का अर्थ सबको सर्वदा सुलभ एवं समीपस्थ होने से है। समीपस्थता, यह सह-अस्तित्व विधि से प्रमाणित है । सह-अस्तित्व एक दूसरे के साथ होने के अर्थ को प्रतिपादित करता है। यह व्यापक वस्तु में संपृक्त, अनंत एक-एक वस्तु की हैसियत से पता लगता है। इसे अध्ययन करने की संपूर्ण प्रक्रिया सहित यह ‘समाधानात्मक भौतिकवाद’ प्रस्तुत हुआ है। दूसरी विधि से, अस्तित्व ही सह-अस्तित्व रूप में वैभवित है।

सह-अस्तित्व का मूल आशय, व्यापक वस्तु में एक-एक रूपी अनंत वस्तुओं की अविभाज्यता ही है। हर एक वस्तु जड़-चैतन्य के रूप में प्रमाणित है। प्रत्येक मानव जड़-चैतन्य का संयुक्त साकार रूप है । इस वांङ्गïमय में परमाणु विकसित होने, जीवन पद प्रतिष्ठïा में वैभवित होने का अध्ययन है।

गर्भाशय में मनुष्य शरीर की रचना भी प्राणकोशाओं से रचित होना स्पष्टï हो चुकी है। फलस्वरूप जीवन सहज, जागृति पूर्वक, अस्तित्व समझ में आने, अस्तित्व, सह-अस्तित्व, विकास, जागृति, रासायनिक, भौतिक रचना-विरचना की क्रमविधि सहज प्रयोजन इस वांङ्गïमय से सम्पन्न होने का आशय है।

            ए. नागराज

            श्री भजनाश्रम, श्री नर्मदांचल

            अमरकंटक, जिला-अनूपपुर

            (मध्यप्रदेश)

Madhyasth Darshan