Economics-Cyclical (आवर्तनशील अर्थशास्त्र)

 
[* Original article in Hindi by A Nagraj]

Economics: avartansheel arthashastra  (आवर्तनशील अर्थशास्त्र)

  • in work & occupation as economics (cyclical economics)- maps to darsana of human action and resolution-centric materialism  which provide its basis. 
  • Contents:
    • The beginnings of identification of resource, definition and beliefs about resource. The realistic-view basis for Cyclical Economics. Perception of Cyclical Economics.
    • Inevitability and nature of cyclicity. Production & Value.  Human is the Basis of Evidence. Awakening and Freedom. Program for family-based village organization system.

 

आवर्तनशील अर्थशास्त्र का प्रयोजन 

मानवीय शिक्षा में आवर्तनशील अर्थव्यवस्था को अध्ययन कराया जाता है। अर्थ की आर्वतनशीलता के मुद्दे पर यह बोध कराया जाता है कि श्रम ही मूलपूंजी है। प्राकृतिक ऐश्वर्य पर श्रम नियोजन पूर्वकउपयोगिता मूल्य को स्थापित किया जाता है। उपयोगिता के आधार पर वस्तु मूल्यन होना पाया जाता है। इस विधि से हर व्यक्ति अपने परिवार में कोई न कोई चीज का उत्पादन करने वाला हो जाता है। इस ढंग से उत्पादन में हर व्यक्ति भागीदारी करने वाला हो जाता है फलस्वरूप दरिद्रता व विपन्नता से और संग्रह सुविधा के चक्कर से मुक्त होकर समाधान समृद्घिपूर्वक जीने का अमृतमय स्थिति गति बन जाती है। इसमें जन संवाद का मुद्दा यही है हम मानव परिवार में स्वायत्तता, स्वावलम्बन, समाधान, समृद्घि पूर्वक जीना है या पराधीन परवशता संग्रह सुविधा में जीना है।

 

आवर्तनशील अर्थव्यवस्था में श्रम मूल्य का मूल्याँकन करने  की सुविधा हर जागृत मानव परिवार में होने के आधार पर वस्तुओ का आदान-प्रदान श्रम मूल्य के आधार पर सम्पन्न होना सुगम हो जाता है। इससे मुद्रा राक्षस से छुटने की अथवा मुक्ति पाने की विधि प्रमाणित हो जाती  है। जिसमें शोषण मुक्ति निहित रहती  है। अतएव संवाद का मुद्दा यही है कि लाभोन्मादी विधि से अर्थतंत्र को प्रतीक के आधार पर निर्वाह करना है या श्रम मूल्य के आधार पर वस्तुओ के आदान-प्रदान से समृद्घ रहना है।

 

* स्त्रोत = अवर्तानशील अर्थशास्त्र, संस १, अध्याय १ से ४ 

अध्याय

अर्थ को पहचानने की शुरूआत क्रम से अर्थ की परिभाषा/मान्यता

वर्तमान में इस धरती पर मानव परंपरा में लेन-देन का जो क्रियाकलाप है पत्र मुद्रा पर आधारित है। प्रतीक मुद्रा के रूप में छपे कागज पर एक से हजारों की संख्या लिखी रहती है और उसी के आधार पर उस मुद्रा का मूल्य माना जाता है। ऐसे सभी कागज वस्तुओं के अनुपलब्धता की स्थिति में एक व्यक्ति के लिए अनाज या एक व्यक्ति की प्यास बुझाने का कार्य नहीं कर सकते।

आर्वतनशील अर्थशास्त्र को हमें लोकमानस के सम्मुख प्रस्तुत करने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ।

इसके पहले अभी तक व्यक्तिवादी समुदायों के रूप में गुजरी बीती मानव परंपरा में तत्कालीन विधियों से मानव को ही स्वीकृत अर्थ का स्वरूप, परिवार में आबंटन, अथवा, बंटन समुदायों में विनिमय, आवश्यकता, संभावना, स्रोत और मानव से किया गया प्रवृत्तियों और कार्यों का सामान्य स्पष्टीकरण को उचित समझकर उसे भी प्रस्तुत किए हैं।

मूलत: आदिमकालीन मानव की परंपरा का संबंध वर्तमान से जुड़ा होना स्वाभाविक है। दूसरी भाषा से नियति सहज है। स्वाभाविक का तात्पर्य हर काल देश में मानव अपनी अपनी सीमा में ही ‘स्व’ को स्वीकार करता हुआ इस धरती पर जीया हुआ है। इसका प्रमाण क्रमागत रूप में पायी जाने वाली पीढ़ी से पीढ़ी ही है। नियति का तात्पर्य विकास क्रम, विकास और जागृति क्रम, जागृति से है। जागृति का तात्पर्य जानने-मानने-पहचानने-निर्वाह करने वाला मानव ही है।

जब कभी भी एक से अधिक मानवों का होना सान्निध्य रूप (सान्निध्य का तात्पर्य साथ-साथ रहने से हैं) में होता है, तभी एक-दूसरे की पहचान होना स्वाभाविक है। संचेतनशीलता सहज मानव में पहिचानने की क्रिया ही न्यूनतम संचेतना का प्रमाण है और सम्बन्धों की पहचान भी न्यूनतम संचेतना का द्योतक है। इसका प्रमाण है, आज भी प्रत्येक स्वस्थ मानव, न्यूनतम रूप में आसपास की चीजों को पहचानता है। आस-पास का तात्पर्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंधेन्द्रियों की पहुँच की सीमा है। संचेतना का तात्पर्य भी जानने मानने पहचानने एवं निर्वाह करने से है।

इस प्रकार इस धरती पर आदिमानव शरीर रचना बंदर भालू आदि किसी जीव जानवरों के शरीर में रचित होकर धरती में स्थापित होना स्वाभाविक रहा। क्योंकि इस धरती में मानव शरीर रचना के पहले किसी एक प्रजाति के जीव शरीर रचना और उसकी परंपरा स्थापित होने के उपरान्त दूसरे प्रजाति की शरीर रचना सहित परंपरा विधियों से विकसित होना देखा जाता है। मेधस युक्त शरीरों में समृद्घ मेधस युक्त शरीरों के क्रम को इस धरती पर देखा जा सकता है। इसी क्रम में मानव शरीर रचना का भी उद्भूत होना, मेधस रचना क्रम एवं उसकी परिपूर्णता के अर्थ में मानव शरीर में ही सर्वोपरि समृद्घ मेधस रचना एवं उसके अनुरूप शरीर कार्य तंत्र स्पष्ट हो चुका है।

 

इसी के साथ यह भी स्पष्ट है कि मानव शरीर रचना के पहले की जितने भी प्रकार के शरीर रचनाएं प्रस्तुत हैं वे भी समीपस्थ वस्तुओं घटनाओं से व्यंजित होना दिखाई पड़ती हैं। व्यंजित होने का तात्पर्य तुरंत ही उस ओर (समीचीन शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) अपने प्रवृत्ति को नियोजित करता हुआ से है। इसलिए आदिमानव का भी समीचीन स्थिति, गति, घटनाओं से व्यंजित होना सहज सिद्घ होता है। झपटी के लिए आक्रमण करते रहा। इसके विपरीत इसकी प्रतिरोध करने का कार्यक्रम अनवरत रहा ही। इस विधि से उक्त दोनों प्रयोजनों के लिए जो-जो वस्तुएं प्राप्त हुई उनकों आज की स्थिति में हम ‘अर्थ’ का नाम दे सकते हैं।

 

 

Madhyasth Darshan