Psychology-Cognitive (मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान)

 
[* Original article in Hindi by A Nagraj]

Psychology: manav sanchetanavaadi manovigyaan  (मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान)

  • in mentality as human-consciousness oriented psychology. – maps to darsana of human realization/experience and experience-centric spiritualism  which provide its basis.
  • Contents:
    • Why the need for research/exploration into Humane Conduct? Human and Complementariness. Exploration & Dissemination.
    • Explanation in detail of 122 conducts in each of the 10 activities in awakened jeevan (conscious unit)

मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान का प्रयोजन 

मानवीय शिक्षा में मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान का अध्ययन  करने कराने का प्रावधान है। मानव संचेतना को मानव संवेदनशीलता और संज्ञानशीलता के रूप में माना गया है। जिसके अध्ययन से संज्ञानशीलता पूर्वक जीने की विधि बन जाती है। संज्ञानशीलता पूर्वक जीने का तात्पर्य मानव लक्ष्य को सार्थक बनाना है।

 

परम्परा के रूप में इसकी निरन्तरता होना हैं। मानव की हैसियत को, मानसिकता को, अथवा जागृति मूलक मानसिकता को महसूस कराता है। साथ में जागृति की महिमा मानव परंपरा के लिए प्रेरणा देता है। क्योंकि मानव संज्ञानशीलता पूर्वक लक्ष्य मूलक विधि से जीना ही मानव परम्परा का वैभव है अर्थात स्वराज और स्वतंत्रता है। इस तथ्य को भली प्रकार बोध कराते है। इसमें संवाद के लिए मुद्दा यही है मानव मूल्य मूलक विधि से जीना हैं या रूचिमूलक  विधि से जीना है।

मानवसंचेतनावादी मनोविज्ञान –  प्राक्कथन

मैं इस मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान रूपी प्रबंध को मानव के समक्ष अर्पित करते हुए, परम प्रसन्नता का अनुभव करता हूँ। कामोन्मादी मनोविज्ञान जो आज शिक्षा में प्रचलित है, (जिसमें कामुकता के आधार पर संपूर्ण वर्चस्व उभरने की बात कही गई है) इससे मैं सहमत नहीं हो पाया क्योंकि मैं सदा समाधान को चाहता हूँ सुखी होना चाहता हूँ, समृद्घि पूर्वक जीना चाहता हूँ। इसी के साथ यह भी मैंने स्वयं को मूल्यांकित किया कि प्रचलित मनोविज्ञान के स्थान पर क्या होना चाहिए। जो कुछ भी प्राप्त साहित्य आज तक है, इसके सहारे इसका उत्तर नहीं निकल पाया।

फलस्वरूप गहन चिंतन किया। इसके परिणाम में यह मनोविज्ञान अपने आप स्फूर्त हुआ। कितनी भी विधाओं में मैंने अनुभव किया, जीकर देखा, उन्हीं तथ्यों को इसमें सत्यापित किया है। यद्यपि साहित्य, मनुष्य के एक छोटे से हिस्से के रूप में प्रस्तुत होता है। मेरा विश्वास इस संप्रेषणा में यही है कि कुछ भी पढ़कर प्रत्येक नर-नारी, उसके आशय को अपनी मानसिक विशालता के आधार पर स्वीकारने और परखने का कार्य किया ही करता है। इस ढंग से शब्द और वाक्य जैसे छोटे प्रकाशन भाग से, उसमें निहित विशालता को ग्रहण कर लेता है। यही मानव की सहज महिमा है।

मानव संचेतना का आशय यही है कि हर मानव कल्पनाशील, कर्म स्वतंत्र है ही। यह सबको विदित है। इसी क्रम में सकारने, नकारने की कार्य शीलता हर मनुष्य के मन में विचार और इच्छाओं में है, फलत: कार्य व्यवहार में प्रकाशित हो पाता है। इनके अतिरिक्त भी मनुष्य इंगित हुई वस्तुओं को, प्रयोजनों के अर्थ में जांचने का भी काम करता है। मैंने मानव के प्रयोजन को समाधान, समृद्घि, अभय तथा सह-अस्तित्व के रूप में पहचाना है। इसके साथ प्रयोजन को सार्थक परम्परा के रूप में प्रमाणित होने के उद्देश्य से ही, इस मनोविज्ञान शा को प्रस्तुत किया हूँ।

मेरा निवेदन है कि, मानव हर निर्णय को, प्रयोजनों के अर्थ में ही, सुदृढ़ रूप में स्वीकारने, अनुप्राणित होने और चरितार्थ रूप देने की स्थिति में है, अत: उक्त मानव सहज उद्देश्य का सार्थक होना अवश्यम्भावी है। इसे हम एक ही शब्द से कहें कि सर्वमानव के सुखी होने के लिए, इस मनोविज्ञान को विचार शैली के रूप में मैंने प्रस्तुत किया है।

इस अभिव्यक्ति में यह भी आशय समाहित है कि हर मानव सच्चाई की तलाश में है। सच्चाई को प्रमाणित करना भी चाहता है। ये दो सामान्य आशय सामान्य व्यक्ति में सर्वेक्षण पूर्वक देखने को मिलता है। अतएव सच्चाई को तलाशने के क्रम में, मैं अपने को एक मानव की हैसियत से ही मूल्यांकित कर पाया। इसी आधार पर तलाश प्रारंभ हुई। मैंने अपने में यह पाया कि मुझमें समझने की अर्हता (क्षमता, योग्यता, पात्रता को प्रमाणित करने योग्य) समाई हुई है।

 

चिंतनपूर्वक समझने के आधार पर उद्देश्य पूर्ति के लिए, अपनी इस विचार-शैली को पहचानने लगा। क्रमश: मैंने अपने जीवन में सह अस्तित्व को साक्षात्कार किया, अनुभव किया। उन्हीं क्रियाकलापों का नाम जीवन अथवा मानसिकता के रूप में – विचारशैली नाम दिया। ऐसी विचारशैली जो मानव लक्ष्य को सार्थक बनाने के लिए तत्पर है। ऐसे एक सौ बाइस (122) रूपों में आकलन किया, उसको क्रमश: संप्रेषित किया। इसमें मुख्य यही प्रणाली चरितार्थ होने के लिए मुझे मिली कि मानवीयतापूर्ण आचरण को मैं प्रमाणित कर पाया। मानवीयतापूर्ण आचरण अपने स्वरूप में – मूल्य, चरित्र, नैतिकता के संयुक्त रूप में मिला। इससे, इस मानवीयतापूर्ण आचरण सहित मेरा, बहुत से ज्ञात अज्ञात व्यक्तियों के साथ, विश्वास पूर्वक जीना संभव हो गया।

यह सर्व विदित तथ्य है कि विश्वास पूर्वक जीना बन जाता है, उसके फलन में व्यक्ति सुखी होता है, यह भी मुझे समझ में आया। विश्वास एवं सुख की अपेक्षा सभी मनुष्यों में विद्यमान है ही। अस्तु मानव कुल के लिए यह मनोविज्ञान साहित्य स्वयं विश्वास पूर्वक जीने, परिवार में जीने, समाज में जीने और व्यवस्था में जीने के लिए प्रेरक होगा। यही मेरी कामना है। मानव हैं तो मानवीयता है ही।

–   ए. नागराज

Madhyasth Darshan