Human Behavior (मानव व्यव्हार दर्शन)

 
[ * English Translated version of Original Hindi]

 darsana of human-behavior (vyawhaar): (manav vyavhar darshan)

  • Provides the existential basis for human-behavior: and answers to humankinds most intriguing questions,  the conscious unit, human-consciousness:
  • Contents:
    • Coexistence. Realistic-view of Creation. Existential-purpose of human being. Non-illusion itself is effortlessness. Action & Result.  Humane Behavior. Planes and Transcendence.  Holistic-view – Observable Reality &Perspective.
    • Liberation from Conflicts. Union.  Traits, Worlds, World-views and Aims of Human-beings.  Religious Ethics, State Ethics. Laws of Human Behavior. Liberation from Mystery.  Happiness, Peace, Contentment and Bliss.

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व्यवहार दर्शन

लेखकीय

मानव में साम्यत: पाये जाने वाले रूप, बल एवं बुद्घि के योगफल से निर्मित पद एवं धन तथा इन सबके योगफल से उत्पन्न शिष्टताओं एवं भौगौलिक संरचनाओं व तद्नुसार आवश्यकताओं के आधार पर परस्पर सामरस्यता की कामना पायी जाती है ।
शिष्टता की वैविध्यता, सम्पत्ति एवं स्वत्व की विस्तार-प्रवृत्ति की उत्कटता के अनुसार मानव में सीमाएं दृष्टव्य हैं । मानव में प्रत्येक सीमित संगठन, प्रधानत: भय-मुक्ति होने के उद्देश्य से हुआ है । सर्वप्रथम मानव ने जीव-भय एवं प्राकृतिक भय से मुक्त होने के लिये साधारण (आहार, आवास, अलंकार) एवं हिंसक साधनों का आविष्कार किया है । इन हिंसक साधनों से मानव की परस्परता में अर्थात् परस्पर दो मानव, परिवार एवं वर्ग एवं समुदायों के संघर्ष में प्रयुक्त होना ही युद्घ है ।

 

इसके मूल में प्रधानत: संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था की वैविध्यता है । साथ ही उसके अनुसरण में स्वत्व एवं सम्पत्ति के विस्तारीकरण की प्रवृत्ति भी है । यही केन्द्र-बिन्दु है । मानव, मानव के साथ संघर्ष करने के लिये, प्रत्येक संगठित इकाई अर्थात् परिवार एवं वर्ग अपनी सभ्यता एवं संस्कृति को श्रेष्ठ मानने के आधार पर स्वत्व और सम्पत्तिकरण के विस्तारीकरण को न्याय-सम्मत स्वीकार लेता है, फलत: उसी का प्रतिपादन करता है और आचरण एवं व्यवहार में प्रकट करता है । यही स्थिति प्रत्येक सीमा के साथ है ।

 

इस ऐतिहासिक तथ्य से ज्ञात होता है कि प्रत्येक सामुदायिक इकाई के मूल में सार्वभौमिकता को पाने का शुभ संकल्प है । उसे चरितार्थ अथवा सफल बनाने का उपाय सुलभ हुआ है, जो ”मध्यस्थ दर्शन” के रूप में मुखरित हुआ है । यह
मानवीयतापूर्ण सभ्यता, संस्कृति, विधि एवं व्यवस्था के लिए प्रमाणों के आधार पर वर्तमान बिन्दु में दिशा को स्पष्ट करता है ।
”वर्ग-विहीन समाज को पाने के साथ ही प्रत्येक व्यक्ति में पाई जाने वाली न्याय-पिपासा, समाधान एवं समृद्घि- वांछा एवं सह-अस्तित्व में पूर्ण सम्मति को सफल बनाने की आप्त कामना के आधार पर मध्यस्थ दर्शन को प्रकट करने का शुभ अवसर मुझे प्राप्त हुआ है ।”
”सह-अस्तित्व सूत्र व्याख्या ही स्वयं में सामरस्यता है।” सामरस्यता की स्थिति रूप, गुण, स्वभाव एवं धर्म की साम्यता समाधान पर आधारित है, जो दृष्टव्य अर्थात् समझ में आता है, जैसे पदार्थावस्था की प्रकृति में रूप सामरस्यता, वनस्पति अर्थात् प्राणावस्था की प्रकृति में गुण सामरस्यता, जीवावस्था की प्रकृति में परस्पर जीने की आशा व स्वभाव सामरस्यता का प्रकटन स्पष्ट है। धर्म सामरस्यता ही मानव में अखंडता है । इसके अतिरिक्त अन्य अवस्थाओं में पाये जाने वाले धर्म, स्वभाव, गुण एवं रूप की सीमा में सामरस्यता की पूर्णता को पाना संभव नहीं है, यदि संभव होता तो मानव के पीछे की अवस्थाओं में सह-अस्तित्व की तृप्ति को जानना, मानना था, किन्तु इनका न होना देखा जा रहा है । फलत: अग्रिम विकास में संक्रमण एवं पद में आरुढ़ता दृष्टव्य है ।

 

मानव में ही धर्म सामरस्यता को पाने की संभावना स्पष्ट हुई है। इसको पा लेना ही मानव का परमोद्देश्य है, उसे सर्व सुलभ कर देना ही मध्यस्थ दर्शन का अभीष्ट है । धर्म सामरस्यता का तात्पर्य सर्वतोमुखी समाधान सम्पन्न होने से है ।
”मानव-जीवन सफल हो”
”अन्य में संतुलन प्रमाणित हो”
– ए. नागराज


 मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु

सत्ता मध्यस्थ है, व्यापक है । सत्ता में प्रकृति सम-विषम और मध्यस्थ क्रिया है, सीमित है । इसलिये सत्ता स्थिति पूर्ण है ।
सत्ता में जड़ चैतन्य प्रकृति स्थितिशील है, इसलिये सत्ता में प्रकृति समायी हुई है। अत:, सत्ता में प्रकृति ओत-प्रोत है । अस्तु, सत्ता में प्रकृति सम्पृक्त है इसलिये ही प्रकृति पूर्णतया ऊर्जा सम्पन्न है। अस्तु, प्रकृति क्रियाशील है। अत: प्रकृति श्रम, गति एवं परिणामशील है । फलस्वरूप प्रकृति ही चार अवस्थाओं में प्रत्यक्ष है । इसलिये सत्ता में संपृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति में से चैतन्य प्रकृति ज्ञानावस्था में अनुभव करने की क्षमता, योग्यता एवं पात्रता से सम्पन्न होने के अवसर समीचीन है तथा चारों अवस्थाएं एक दूसरे से पूर्णता संपूर्णता के अर्थ में अनुबंधित हैं ।
सत्ता मध्यस्थ है । इसलिये मध्यस्थ सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति नियंत्रित एवं संरक्षित है । प्रत्येक परमाणु में पाये जाने वाला मध्यांश (नाभिक) मध्यस्थ क्रिया है । इसलिये सम-विषमात्मक क्रियाएं एवं सापेक्ष शक्तियाँ नियंत्रित एवं संरक्षित हैं ।
अनन्त क्रिया अथवा क्रिया-समूह ही प्रकृति है, जो जड़ और चैतन्य के रूप में गण्य है । जड़ प्रकृति ही विकास पूर्णता के अनन्तर चैतन्य-पद को पाती है यह नियति विधि से सम्पन्न रहता है । मानव जड़ एव चैतन्य का संयुक्त रूप है साथ ही प्रकृति का अंश भी है ।
विकास क्रम में गठनपूर्णता ही विकास/जागृति क्रम में भ्रमित मानव में जागृति ही क्रिया-पूर्णता एवं आचरण-पूर्णता है । जागृत मानव कम विकसित प्रकृति के साथ व्यवहार व्यवसायपूर्वक, प्रयोजनीयता का पोषण करता । मानव का मानव के साथ व्यवहार,
अधिक जागृत के साथ गौरव करना दायित्व है तथा अधिक जागृति के लिये अभ्यास, अध्ययन एवं चिंतन करता है ।
भ्रमित मानव ही कर्म करते समय स्वतंत्र एवं फल भोगते समय परतंत्र है ।
इस पृथ्वी पर मानव जागृति क्रम में है । उसे जागृतिपूर्ण होने का अवसर, वांछा एवं संभावना प्राप्त है । जागृत मानव का कम विकसित के लिए सहायक होना ही उसका प्रधान लक्षण है ।
पदार्थावस्था से प्राणावस्था विकसित, प्राणावस्था से जीवावस्था विकसित, तथा जीवावस्था से भ्रांति ज्ञानावस्था का पशु-मानव विकसित है । भ्रांति ज्ञानावस्था के पशु-मानव से भ्रांत राक्षस मानव विकसित, भ्रांत राक्षस मानव से भ्रांताभ्रांत मानव विकसित तथा भ्रांताभ्रांत मानव से निभ्रान्त देव मानव विकसित है। निभ्रान्त देवमानव से दिव्यमानव विकास एवं जागृति पूर्ण है।
ज्ञानावस्था की इकाई दर्शन क्षमता सम्पन्न है । दर्शन, व्यापक में अवस्थित जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति के संदर्भ में है ।
निर्भ्रम अवस्था में ही अनुभव ज्ञान व दर्शन पूर्ण होता है । इसलिये –
निर्भ्रमता ही जागृति, जागृति ही प्रबुद्घता, प्रबुद्घता ही संप्रभुता, संप्रभुता ही प्रभुसत्ता, प्रभुसत्ता ही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था है ।
”मानव ही मानव के ह्रास व विकास में प्रधानत: सहायक है ।”

 

”ज्ञानात्मनोर्विजयते “


 अनुक्रमणिका

1. सह-अस्तित्व
2. कृतज्ञता
3. सृष्टि-दर्शन
4. मानव सहज प्रयोजन
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
6. कर्म एवं फल
7. मानवीय व्यवहार
8. पद एवं पदातीत’
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
10. क्लेश-मुक्ति
11. योग
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
13. मानवीयता
14. मानव व्यवहार सहज नियम
15. मानव सहज न्याय
16. पोषण एवं शोषण
a. मानव धर्म नीति
b. मानव राज्य नीति
17. रहस्य-मुक्ति
18. सुख-शान्ति-सन्तोष और आनन्द

 

*स्रोत: व्यवहारात्मक जनवाद, संस-२००२, पृ 169 से 176

मानव व्यवहार दर्शन

मानवीय शिक्षा में मानव व्यवहारदर्शन का अध्ययन कराना होता है जिसमें अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का बोध, इसकी आवश्कता का बोध कराया जाता है। मानव व्यवहार में प्राकृतिक नियम, बौद्घिक नियम और सामाजिक नियमों को बोध कराने की व्यवस्था रहती है। जिससे समाज की सुदृ$ढता, वैभव पूर्णता का बोध कराया जाता है।

फलस्वरूप हर मानव अखंड समाज के अर्थ में अपने आचरणों को प्रस्तुत करना प्रमाणित होता है। इस प्रकार ऐसे अखंड समाज के अर्थ में सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी स्वयं स्फूर्त विधि से सम्पन्न होना होता है। यही स्वतंत्रता और स्वराज्य का प्रमाण है। अस्तु संवाद का मुद्दा है अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था के अर्थ में जीना चाहिये या समुदाय गत राज्य के अर्थ में जीना चाहिये।


Principle postulations in Madhyasth Darshan

Originally in Hindi by A Nagraj. English version by Shriram N | student | january 2015

Omnipotence (space) is Mediating (madhyasth*), it is all-pervasive.  Nature in Omnipotence is as attractive, repulsive, and mediating (madhyasth) activities and is limited.  Therefore Omnipotence is in the complete(perfect)-state.

Material and conscious nature in Omnipotence (space)  is continuously-evolving therefore nature is contained in the Omnipotence (space) .   Therefore, Nature is totally inundated in the Omnipotence (space) .  As nature is saturated in the Omnipotence (space) , therefore, nature is fully-energized. In other words nature is continuously-evolving.  Therefore, nature continuously manifests effort, motion, and constitution.  As a result, nature itself is perceivable in four natural-orders.  For this reason, out of the physio-chemical and conscious nature saturated in Omnipotence, the opportunities for conscious nature for attaining the potential, ability, and receptivity for realization are always close, and the four natural-orders are completely bound amongst each other for wholeness.

 

Omnipotence (space)  is Mediating (madhyasth). Therefore, nature saturated in Mediating (madhyasth) Omnipotence is restrained and protected. The central-part (nucleus) found in every atom is the Mediating (madhyasth)-activity. Therefore, attractive and repulsive activities and relative forces (in every atom) are restrained and protected.

Infinite activities or groups of activities itself is nature, which is recognizable as physiochemical (jad) and conscious (chaitanya).  Physiochemical nature itself attains the conscious-plane after development-completeness. This is by way of existential destiny. Human-being is a combined form of physiochemical and conscious, and at the same time is also a part of nature.

 

In (the process of) development-progression, constitutional-completeness itself is development, while (in the process of) awakening-progression, awakening in deluded human-beings itself is functional-completeness and conduct-completeness. The Awakened human-being nourishes purposefulness and right-use by way of behavior and occupation with less-developed nature. Human-being has the responsibility for behavior with other humans, glory with those more awakened, and practices, studies and contemplates for higher awakening. .

Only a human-being in delusion is free at the time of performing actions but subservient at the time of receiving the results.

 

Human-beings on this Earth are in awakening-progression.  The opportunity, expectation, and possibility for becoming awakened is available to them.  The primary trait of an awakened human-being is his being helpful for less-evolved ones.

Respirating-order (pranic-order) is more evolved than material-order, animal-order is more evolved than respirating-order (pranic) and servile-human (pashu-manav) of knowledge-order in illusion is more evolved than animal-order.  Beastial-human (rakshas-manav) of knowledge-order in illusion is more evolved than the servile-human in illusion, Human with discernment (bhrant-abhrant) is more evolved than the beastial-human, and godly-human (dev-manav) in non-illusion is more evolved than the human with discernment.  Divine Human (Divya-manav) with complete-awakening is more evolved than godly-human with non-illusion.

 

Units of knowledge-order are endowed with the capacity for realistic-view (darshan). Realistic-view (darshan) is in the sense of physiochemical and conscious nature situated in all-pervasive entity or Omnipresence.

It is only in the non-delusion state that realization-knowledge and realistic-view (darshan) get completed.  Which is why –

Non-delusion itself is awakening; awakening itself is holistic-intelligence; holistic-intelligence itself is holistic-authority; holistic-authority alone is universal-sovereignty; universal-sovereignity alone is undivided-society and universal-orderliness

“Humankind alone is primarily responsible for the rise and fall of Humankind”

– A Nagraj, 1977

 

(* Translator note: ‘madhyasth’ = ‘Mediating’ = Restraining of positive and negative (properties). Unaffected by positive and negative (properties). The grandeur of normalizing of all excited-states and remaining unaffected by excited-states. The word ‘Mediating’ has been used hereon and should be understood with its definition. Omnipotence = space = energy in equilibrium)


[* from the book 'Manav Vyawhaar Darshan'; Chapter -1] 

Coexistence

  • I present the analytical-reasoning  of “Realistic-view of Human-Behaviour” while recollecting realization in physiochemical and conscious nature saturated in eternal, true, pristine and absolute all pervasive Omnipotence.
    • Eternal (nitya): – Always present in the same way.
    • True (satya): – Always sensed, intuited,and known in the same way.
    • Pristine (shuddh): – Always blissfulin the same way (in realization).
    • Absolute (buddh): – Always gets understood in the same way.
    • Omnipotence (satta): – The eternal grandeur present in all places where nature is, and where nature is not.  Omnipotence is permeable  in material and conscious nature and it is transparent  in their mutualities Omnipotence is also termed as paramatma, God, supreme-lord, consciousness, absolute-energy and perfect
    • Saturation (samprikt): – All material and conscious nature is immersed, surrounded, and soaked in the Omnipotence. This itself is co-existence, co-existence itself is eternal, this itself is knowledge.  In co-existence itself law, restraint, balance, justice, dharma, and absolute truth are evident.
    • Material (jad): – Units that are continuously-active within the expanse of their length, width, and height.
    • Conscious (chaitanya): – Units that are continuously-active in whirl-form in a span that is more than their length, width, and height.

 

  • Awakened human-being alone is counted in the seer-plane
    • Human-being (manav): – One who materializes his ideas and is wantful of healthiness of mind and realises the same is known as human-being.
    • Behaviour (vyavhar): – The deployment of effort for more than one human-beings coming together or being together is known as behaviour.
    • Realistic-view (darshan): – Understanding, conception, and realizationattained from perspective alone is known as realistic-view.
    • Perspective (drishti): – Activity of seeing, understanding, recognizing, and evaluating the realities is perspective.
    • Analytical-reasoning (vishleshan): – Elucidation of definitions for explaining existential-purpose.
    • Definition (paribhasha): – Group of words used to indicate meaning

 

  • Omnipresence is undivided and units are countless.
    • Omnipresence (vyapak): – That which is there at all places and times and is eternal-presence.
    • Unit (ikai): – Body of matter limited from six sides (from all sides) itself is unit.  In the Omnipresence, entire units are inseparably present in co-existence.
    • Countless (anant): – That which cannot be captured in any number itself is countless. That which a human-being is incapable of counting, nor does the need arise for counting it, that itself is countless.

 

  • All-pervasive Omnipotence is there in, from, and for an awakened human-being as law at the time of work and behaviour; as resolution at the time of thinking; as bliss at the time of realization; as justice at the time of conduct – because entire nature saturated in the Omnipotence is in the form of inseparable presence.  This itself is co-existence.
    • Time (kaal): – Duration of activity itself is time.
    • Law (niyam): – The foundation of restraint   in conduct and activity  itself is law.
    • Resolution (samadhan): – Being fulfilled by having answers of every why and how itself is resolution.
    • Bliss : – Realization in absolute-truth in the form of co-existence itself is bliss.
    • Justice (nyaya): – Behaviour of humanness in mutualities  itself is justice.
      • Behaviour of Humanness (manviyata poorna vyavhar): – svabhav of steadfastness, courage, generosity, kindness, graciousness and compassion; holistic-perspective of justice, dharma (orderliness), and truth; and behaviour with tendency of righteously realizing motives of progeny, wealth, and fame itself is behaviour of humanness.
        • Human-being has been and will continue to endeavor and study for knowing, recognizing, and becoming enlightened in, from, and for existence.

 

  • Realization in co-existence itself is exposition of knowledge.  Study is for, from, in realization in co-existence.  Knowledge alone is evidenced in the form of wisdom and science.  This is the essence of humanness in knowledge-order.
    • Knowledge while not doing activity itself or while not being an activity is evidence of blissful-grandeur in human-self’s state of realization.  Realization expression itself is knowledge.  Knowledge itself is the basis and source-of-inspiration for entire positive activities in an awakened human-being.

 

  • Knowledge itself is Space and Space itself is Knowledge.
      • The state (reality) of non-activity is known as Space, and knowledge while not doing any activity or while not being an activity is the basis (adhar) and source-of-inspiration of entire activities.  Therefore knowledge and Space prove to be one and the same – and it is only from being situated in it, inspiration for activity always remains available.  There is no unit which is devoid of or liberated from knowledge or Space.

“May there be Universal Goodness”

– A Nagraj, 1977 


 

-shriram n | student | based on first version by rakesh gupta
Madhyasth Darshan