Human History (मानव इतिहास)

 

समाधान और द्वन्द्व

*स्त्रोत = समाधानात्मक भौतिकवाद, संस १९९८, अध्याय १, २ 

समाधानात्मक भौतिकवाद के नाम से मानव में अनेक प्रश्न उभरना स्वाभाविक है। जब से मानव सुनने-सुनाने योग्य हुआ, तब से भय और प्रलोभन वश ईश्वरवादिता क्रम में से ईश्वर को श्रेष्ठ तथा जीव-जगत का कत्र्ता, भरता, हरता मानता ही आया। कुछ समय बाद भौतिकता का नाम आया, तब से भौतिकतावादी, भौतिकता को अपने में द्वन्द्व ही बताते आये हैं। द्वन्द्व बताने वाले अपने को अत्यधिक वैज्ञानिक मान लिए हैं। विज्ञान को विधिवत अध्ययन मानते है। विधिवत अध्ययन का सार तर्क संगत होने से है। इस विधि से अथवा उपक्रमों से मानव ने भौतिक संसार में संधर्ष विधि से विकास को माना, जबकि आदर्शवादियों ने जगत् को ईश्वर की कृपा से उत्पन्न मान लिया।

द्वन्द्व कहने के मूल में अंतरविरोध और बाह्य विरोध नामक दो बातों की स्वीकारते हुए, अंतर्विरोध को विकास का आधार बताया गया। बाह्य विरोध को संघर्षपूर्वक स्व-वैभव अथवा स्वयं की ताकत को प्रदर्शित करने का आधार बताया गया। जबकि वास्तविकताओं का परिशीलन करने पर इसके विपरीत तथ्य उभर आए। जैसे:-

1.         प्रत्येक एक अपने वातावरण सहित संपूर्ण है।

2.         प्रत्येक एक अपने त्व सहित व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है।

3.         प्रत्येक एक अपनी स्वभाव गति में विकास की ओर और आवेशित गति में ह्रïास की ओर गतिशील होता है।

4.         परस्पर नैसर्गिकता में ही आवेशित गति और स्वभाव गति का होना स्पष्टत: पाया जाता है।

जैसे यह धरती शून्याकर्षण विधि से अपनी स्वभाविक गति में निरतंर गतिशील है। यह अपने में से एक व्यवस्था है ही। समग्र व्यवस्था में भागीदारी का प्रमाण एक सौर -व्यूह में भागीदारी के रूप में प्रमाणित है। सौर व्यूह में जितने ग्रह गोल हैं, उनके साथ अपनी गति को भागीदारी के रूप में अर्पित किया ही है। इससे यह सूत्र निकलता है कि ‘‘जो स्वयं व्यवस्था सहज रूप में नित्य वर्तमान रहता है, वह समग्र के साथ व्यवस्था में भागीदार हो पाता है।’’

यह धरती अपने में व्यवस्था है। इसके साक्ष्य में इसी धरती पर चारों अवस्थाओं ने सह-अस्तित्व को प्रमाणित किया है। इसी धरती पर पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था देखने को मिला है। यह सब देखने वाला अर्थात् समझने वाला ज्ञानावस्था का मानव ही है। ये सब प्रकार की अभिव्यक्तियाँ, इस धरती में होने के मूल में उसकी स्वभाव गति ही रही है, क्योंकि ‘‘प्रत्येक एक अपनी स्वभाव गति प्रतिष्ठा में ही अग्रिम विकास व यथा स्थिति को प्राप्त कर लेता है। क्योंकि प्रत्येक एक के लिए स्वभाव गति में सहज ही नैसर्गिकता, वातावरण एवं परंपरा आदि, ये सब अनुकूल रहते आया है।’’ किसी एक परमाणु या अणु को या एक मानव को स्वभावगति में रहने के लिए अनुकूल परिस्थिति का अथवा किसी जीव या वनस्पति को उन उनकी स्वभाव गति में रहने योग्य वातावरण, नैसर्गिकता और परस्परता मिल जाए, तब उनमें जो परिवर्तन देखने में आवेगा वह सब पहले से अधिक दृढ़ता तथा गुणात्मक और मात्रात्मक रूप से विपुलता की ओर परिवर्तित होता हुआ देखने को मिलता है।

इसे और भी स्पष्टता से देखें कि मानव जन्म से ही अर्थात् शरीर यात्रा के समय से ही न्याय का याचक, सही कार्य करने का इच्छुक और सत्य वक्ता होता है। यह शिशु की स्वभाव गति है। इसके अनुकूल परिस्थिति, वातावरण, नैसर्गिकता और परस्पता को स्थापित करने की स्थिति में मानव संतान में –

1.         न्याय प्रदायिक क्षमता,

2.         सही कार्य-व्यवहार करने की योग्यता तथा

3.         सत्यबोध होने की पात्रता-सहज प्रमाणित होती है।

उक्त उदाहरण से यह भी हृदयंगम होता है कि मानव परंपरा में सानुकूलता के आवश्यकीय तथ्य स्पष्ट होते हैं। ऊपर स्पष्ट किया गया है कि इसके लिए पहले से, मानव परंपरा में अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन रुपी अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान सहज ऐसा अधिकार स्थापित हुआ रहता है तभी ऐसी सानुकूल परिस्थिति को स्थापित करना संभव हो पाता है। अभी तक मानव परंपरा में ऐसी स्थिति नहीं बन पाई है। जबकि मानवेतर प्रकृति अर्थात् पदार्थ, प्राण एवं जीव प्रकृति सानुकूलता के साथ ‘‘त्व’’ सहित व्यवस्था के रूप में है। इनमें सानुकूलता का अध्ययन और मानव में सानुकूलता का अध्ययन विधि का भिन्न होना पाया जाता है। इनमें पदार्थावस्था की वस्तुओं को देखने पर पता चलता है कि मानव निर्मित अधिक आवेशित वातावरण से भी स्वयं स्वभावगति में रहने की स्थिति में, स्व विकास क्रम स्थिति को प्रमाणित कर लेता है। जैसे एक परमाणु अपनी स्वभाव गति में रहते हुए एवं दूसरा परमाणु अपने आवेशित गतिवश उनमें निहित कुछ अंशों को बहिर्गत करने के लिए विवश होने की स्थिति में पहला वाला (परमाणु) अपने में उन बहिर्गत अंशों को आत्मसात करता हुआ मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि पदार्थावस्था में आवेशित गति भी पूरक हो पाता है, जबकि मानव आवेशित गतिवश, स्वयं भ्रमवश क्षतिग्रस्त होता ही है, अन्य को भी क्षतिग्रस्त कर देता हैं। पदार्थावस्था में अपने समृद्घ होने के लिए, जितने भी प्रकार के परमाणु अणु और अणु रचित पिण्डों के रूप में समृद्घ होने तक स्वभाव गति और आवेशित गति का परस्पर पूरक होना स्पष्ट होता है।

प्राणावस्था में वनस्पतियाँ अपनी स्वभावगति में रहने के लिए सानुकूल वातावरण चाहती हैं, जो पदार्थावस्था से भिन्न है। वनस्पतियाँ मूलत: बीजानुषंगीय व्यवस्था की अभिव्यक्ति है। वनस्पतियों के लिए सानुकूल वातावरण प्रधान रूप में ऋतु-संतुलन है। ऋतु संतुलन का तात्पर्य आनुपातिक वर्षा का होना, आनुपातिक रूप में शीत होना, आनुपातिक रूप में गर्म होना है। वनस्पतियों में होने वाली दिनचर्या को देखने पर पता चलता है कि ऊपर कहे तीनों प्रकार की उपलब्धियाँ किसी सीमा तक सह पाती हैं अर्थात् अनुकूल होना प्रमाणित हो पाता है। किसी अनुपात के अनन्तर अर्थात् किसी अवधि के कम या अधिक होने से प्रतिकूलता प्रमाणित होती है अर्थात् वनस्पतियाँ मर जाती हैं। वास्तविक रूप में उनके रचनाक्रम और वैभव क्रम में प्रतिकूलता उसकी विरचना के रूप में होना देखा जाता है। इसी घटना को मरना भी कहा जाता है। इसका तात्पर्य यही हुआ कि सम्पूर्ण वनस्पतियाँ जीव शरीर और मानव शरीर भी प्राण कोशाओं से रचित है। इस कारण यह न्यूनतम अधिकतम ऊष्मा में संतुलित रहता हैं। इसी प्रकार न्यूनतम अधिकतम पानी को पाकर और न्यूनतम अधिकतम ठंडी को पाकर ही अपने संतुलन को स्वभाव गति के रूप में रख पाता है। इसी के साथ अर्थात् ऋतुमान के साथ ही सानुकूल रूप में धरती, हवा और उर्वरक संयोग भी महत्वपूर्ण कारक तत्व है।

ऊपर कहे गए सभी तत्व यथा-शीत, ऊष्ण, वर्षा, हवा, धरती और उर्वरकता का संतुलन यह धरती अपनी स्वभावगति प्रतिष्ठा के आधार पर स्पष्ट कर चुकी तभी जीव और मानव संसार इस धरती पर पनपे। इस प्रकार इस धरती की स्वभावगति प्रतिष्ठा में स्थित प्रत्येक मानव को समझ में आता है। अस्तु, प्राणावस्था की सम्पूर्ण रचनाओं के लिए अपनी परंपरा सहज स्वभाव गति को अक्षुण्ण बनाए रखने हेतु उक्त पाँचों कारक तत्वों का संतुलित रहना एक आवश्यकता है। इस प्रकार प्राणावस्था और प्राणावस्था की संपूर्ण रचनाएँ पदार्थावस्था से विकसित दिखते हुए, वातावरण और नैसर्गिकता सहज कारक तत्वों का सहअस्तित्व सहज पूरकता अनिवार्य रहना दृष्टव्य है।

इस विश्लेषण में भी अंतविर्रोध बाह्य विरोध के स्थान पर अंतर्सम्बधों में संतुलन बाह्य संंबधों में भी संतुलन इनके संयोग में सामन्जस्यता प्रमाणित होती हैं। यह समाधान का साक्षी है।

ऊपर किए गए विश्लेषण से यह भी स्पष्ट हुआ कि सह-अस्तित्व में ही स्वभावगति और आवेशित गति परस्पर सानुकूलता, प्रतिकूलता आवश्यकता, उपलब्धि, संभावना ये सब मानव में, से, के लिए अध्ययनगम्य होते हैं। इसकी आवश्यकता इसीलिए है कि ‘‘मानव स्वयं संतुलित स्वभावगति संपन्न समाधान सहज रूप में वैभवित हो सके।’’

‘‘जीवों की सानुकूलता और स्वभाव गति प्रधानत: आहार, विहार व प्रजनन कार्य में प्रमाणित हो पाती है।’’ जीवों में शाकाहारी और मांसाहारी प्रजातियाँ देखने को मिलती हैं। इन इनके अंग अवयव की संरचनाओं में विशेषताएँ देखने को मिलती है।

उदाहरण के रूप में मासांहारी और शाकाहारी पशुओं के हाथ, पैर और नाखून, सींग खुर आदि रचनाओं में अंतर होना पाया जाता है। प्रधानता: आंतो की रचना, नाखून और दांत की रचना मौलिक रूप में पहचानने में आती है। मांसाहारी पशुओं में आंते लम्बाई में छोटी होती हैं और शाकाहारी पशुओं की आंते बड़ी होती है। यह एक मौलिक आधार है। इसी क्रम में नाखून और दांतों की बनावट में भी अन्तर होना पाया जाता है। शाकाहारी सभी जीव होठों से पानी पीते हैं जबकि मांसाहारी जीव समुच्चय जीभ से पानी पीते है। सभी पशुओं में चाहे वे मांसाहारी हों या शाकाहारी वंशानुषंगीय विधि से परंपरा होना देखने को मिलता है। जैसे:- हाथी, घोड़ा, कुत्ता, बिल्ली, भेड़ अपने अपने वंशानुषंगीय शरीर रचना और प्रवृति जो जीवन का वैभव हैं से युक्त होते है। इनके अर्थात् शरीर और जीवन के संयोग से संम्पूर्ण प्रजाति के पशुओं का संतुलन और नियंत्रण होना पाया जाता है। इनमें संतुलन का आधार पहचानने के क्रम में पशु अर्थात् जीव जातियों का मांसाहारी और शाकाहारी होना पाया गया है। पदार्थ, प्राण, जीव इन तीनों अवस्थाओं में परस्पर पूरकता सिद्घांत प्रभावशील रहता ही है। जैसे पदार्थावस्था प्राणावस्था के लिए प्राणावस्था पदार्थावस्था के लिए पूरक है- यह स्पष्ट है। ये दोनों अवस्थाएँँ जीवावस्था के लिए पूरक हैं। जीवावस्था भी प्राणावस्था और पदार्थावस्था के लिए पूरक है यह प्रमाणित है। जैसे- सम्पूर्ण जीव पूरक होने के क्रम में पदार्थावस्था को अपने मल, मूत्र और शरीर के उपयोग से और वनस्पतियों में होने वाले अनेक संक्रामक और आक्रामक रोगों को अपने मल मूत्र श्वास एवं शरीर गंध से दूर करने में सहायक हुए हैं। जीवों का मल मूत्र और श्वसन क्रिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हुआ देखने को मिलता है। इस प्रकार इन तीनों अवस्थाओं का परस्पर पूरक होना, देखने को बन पाता है।

मानव ज्ञानावस्था की इकाई होते हुए इस बीसवीं शताब्दी के दसवीं दशक तक मानवेत्तर प्रकृति के साथ पूरक होने के स्थान पर इन्हें सर्वाधिक क्षतिग्रस्त करने में लगा ही रहता है। इतना ही नहीं, मानव मानव के साथ विद्रोहात्मक -द्रोहात्मक, शोषणात्मक और युद्घात्मक विधियों को अपनाता हुआ स्वयं क्षतिग्रस्त होते हुए अनेकों को क्षतिग्रस्त करने -कराने में लगा रहता है। यह सुदूर विगत से आई समस्याओं का निचोड़ है। इन समस्याओं का समाधान भौतिक-रासायनिक वस्तुओं तथा जीवन व्यापक और अनंत इकाई रुपी वस्तुओं के अविभाज्य अध्ययन से संभव है। इससे समाधानात्मक अवधारणाएँ मानव सुलभ होती हैं। ऊपर की बातों में मानव के अतिरिक्त तीनों अवस्थाओं के अध्ययन की झलक आई है। उसके अनुसार और वर्तमान में यही देखने को मिलता है कि ‘‘अस्तित्व में प्रत्येक एक अपने त्व सहित व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है।’’ इसके प्रमाणों को पूरक विधि से पदार्थावस्था, प्राणावस्था जीवावस्था में वर्तमान होना स्पष्ट किया गया। इसी क्रम में मानव में, से, के लिए भी व्यवस्था अपेक्षित है।

‘‘अस्तित्व में व्यवस्था ही समाधान है, अव्यवस्था ही समस्या है’’ मानव अभी तक समस्याओं से जूझते ही आया है। अभी तक मानव अपने को एक इकाई मानने में शंकाग्रस्त है और संकटग्रस्त भी है। इसीलिए समाधानात्मक भौतिकवाद के प्रति शंका अथवा आश्चर्य होना भी संभव है। मनुष्य सहज रूप में जानने-मानने-पहचानने के आधार पर एक योग्य इकाई है। सह-अस्तित्व सहज विधि से ही विश्वास होने के कारण मैं यह विश्वास करता हूँ कि मानव यथार्थता, सत्यता, वास्तविकता को हृदयंगम कर सकता है । यथार्थ यही है कि ‘‘मानव मानवत्व सहित व्यवस्था है’’ और समाधान है। मानवत्व से व्यवस्था के रूप में प्रमाणित होने के लिए सर्वप्रथम एक व्यक्ति का सर्वतोमुखी समाधान संबंधी तथ्यों में ओत-प्रोत होना या दूसरी भाषा में अधिकार संपन्न होना आवश्यक रहा है। यह होना अब संभव हो गया है। इसका प्रमाण यही है कि ‘‘समाधानात्मक भौतिकवाद’’ मानव के सम्मुख प्रस्तुत है।

मानव सहज रूप में ही अपनी कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता सहज महिमा के आधार पर अनेक प्रयोग करता है अथवा करने योग्य है ही। कल्पना करने पर पता चलता है कि हर व्यक्ति अपने में समाधान चाहता है। इसी प्रकार न्याय चाहिए या अन्याय, शांति चाहिए या अशांति, संघर्ष चाहिए या समाधान-इन सब कल्पनाओं में मानव सहज ही शांति, न्याय, समाधान जैसे तथ्यों को स्वीकारता है।

मानव स्वाभाविक रूप में ही सुख चाहता हैं भले ही सुख को वह नहीं जानता, इसके बावजूद वह सुख का पक्षधर होता है। अधिकांश मानव सुख के लिए ही रुचियों, प्रलोभनों के पीछे दौड़ते रहते हैं। इस तथ्य के निरीक्षण परीक्षण के उपरान्त यह निष्कर्ष निकलता है कि परम्परा जिन दिशा कोणों में प्रोत्साहित करता है अथवा जितना जागृत हुआ रहता हैं उसी के अनुरुप दिशा निर्देशन कर पाता है। परम्परा का तात्पर्य शिक्षा-संस्कार, संविधान और व्यवस्थाओं का अविभाज्य रूप में क्रियारत होना है। यह एक सहज प्रमाण है कि हर समुदाय किसी न किसी संविधान, शिक्षा, व्यवस्था तथा संस्कार को अपनाया रहता है। इसे इस धरती के सभी समुदायों में निरीक्षण परीक्षण करके देखा जा सकता है। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि उन चारों आयामों के संबंध में मानव की कर्म स्वतंत्रता कल्पनाशीलता ने सहज रूप में कार्य किया है। अभी तक किसी एक अथवा एक से अधिक समुदायों में स्थापित संविधान व्यवस्था और संस्कार सभी समुदायों के लिए स्वीकृत नहीं हो पाया। सभी समुदायों में मानव विचारशील रहे हैं। समीचीन ज्ञान विज्ञान के अनुरुप अभय और शांति सबको सुलभ होने के उद्देश्य से ही सभी संविधानों की स्थापना हुई है। प्रत्येक समुदाय अपने संविधान के अनुरुप शिक्षा, संस्कार, राज्य और धर्म व्यवस्था पाने की आशा और आकंाक्षा से इसमें अर्पित होते आया है। आज भी ऐसी ही स्थितियाँ देखने को मिलती हैं। इस प्रकार सभी समुदायों में संविधान, शिक्षा, संस्कार व्यवस्था संबंधी तथ्यों को सोचते हुए समुदाय चेतना से विवश होकर समस्त कार्य किए गए। फलत: वाद-विवाद व द्रोह-विद्रोह की संभावनाएँ आदिकाल से अभी तक बनी हुई है। यह समस्या विश्व मानव के सम्मुख स्पष्ट है अर्थात् समुदायों के सम्मुख स्पष्ट है।

उक्त समस्या के कारण तत्वों का निरीक्षण परीक्षण किया गया। इसका उत्तर यही मिला कि मानव ने मूलत: मानव को पहचानने में सह-अस्तित्व रूपी परम सत्य को समझने में ही भूल किया है।

इस पृथ्वी पर सर्वप्रथम मानव के अवतरण समय को जंगल युग अथवा शिलायुग का नाम दिया गया है। सर्वप्रथम एक से अधिक मानव अवतरित हुए ऐसा माना गया है। इसका कारण मानव की कल्पनाशीलता के अनुसार एक से अधिक नर-नारी होने से ही मानव परंपरा में प्रजनन कार्य संभव है। इस क्रम में सर्वप्रथम इस धरती पर एक से अधिक मानव अवतरित हो गए। सबसे पहले किस प्रकार से मानव का अवतरण संभव हुआ इस बात के लिए तमाम कल्पनाएँ होती हैं। किसी का सोचना बंदर, किसी का सोचना भालू, किसी का सोचना मछली, किसी का सोचना गाय। ये सब कल्पनाएँ की जा सकती है। यह सहज रूप में पाया गया है कि वनस्पतियों में अनेक बीज परंपराएँ, किसी एक परंपरा के बाद ही स्थापित हुई हैं, और जीवों में किसी एक वंश परंपरा के अनन्तर ही अनेक वंश परंपराएँ स्थापित हुई है। इस क्रम में वंश सूत्र का परंपरा में ही होने वाले अनुसंधान अर्थात् अनुकूल परिस्थितियों का उन्नतोन्नत रूप में व्यक्त करने के क्रम में किया गया सहज प्रयास ही है। इसी क्रम में मानव प्रजाति का अवतरण कोई भी जीव योनि मूलक विधि से मानव का होना संभव है। जिसमें समृद्घ मेधस रचना का प्रावधान परंपरा में रहते आया हो। इस मुद्दे पर कितना भी सूक्ष्म अध्ययन करें, वह सारा अध्ययन शरीर रचना के ही संबंध में हो पाएगा। शरीर रचना मानव परंपरा में, अपने ही स्वरुप में संपन्न हो ही रहा है। शरीर का संपूर्ण उपयोग जीवन की अभिव्यक्ति, जागृति का प्रमाणीकरण के लिए (माध्यम) है। मानव परंपरा में इसकी आवश्यकता है। अस्तु, मानव का इतिहास आदि मानव से होना सहज है।

 

मानव स्वरूप का इतिहास

अध्याय-2

(1)        सामुदायिक इतिहास

उक्त प्रकार से आदि मानव ने एक स्थान अथवा देश में शरीर यात्रा प्रांरभ किया, या एक से अधिक देश अथवा स्थान में आरंभ किया – यह प्रश्न मानव को सोचने के लिए बाध्य करता हैं। इसका सत्य सहज उत्तर है कि आदिकाल में एक परिवार ने दूसरे परिवार को नस्ल के आधार पर पहचाना। यही पहली और ऐतिहासिक भूल या घटना हुई। आज हमें यह ज्ञात है कि नस्ल का आधार भौगोलिक, नैसर्गिक परिस्थितियाँ है। रंग का आधार भी भौगोलिक, नैसर्गिक परिस्थितियाँ है। पूजा व प्रार्थनाएँ कल्पनाशीलता के आधार पर निर्मित हुई। साधना का आधार श्रेष्ठता की अपेक्षा निष्ठा पर रहा। धर्म कहलाने वाले सभी प्रक्रियाएँ सामुदायिक शासन नियंत्रण और आश्वासन पर निर्भर रहीं। इसके लिए आज यही सोचा जा सकता है कि मानव की जागृति मानव के संबंध में नस्ल तक ही रही है। इसका प्रकाशन लड़ाई के रूप में हुआ। अर्थात् एक परिवार दूसरे परिवार को नस्ल, रंग के आधार पर क्रूर जीव-जंतु मानकर लड़ लिया। फलस्वरुप नस्ल के आधार पर समुदाय चेतना अर्थात् अपना पराया वाली सीमाएँ बनती रही। दूसरी बार भिन्न-भिन्न रंगों के मानव देखने को मिले। उसी के आधार पर एक दूसरे को मारकाट करने वाले मानकर झगड़़ा कर लिया। फलस्वरुप परिवारों में अथवा समुदायों में भिन्न-भिन्न रंग और नस्ल की दीवालें पनपती आई। इस प्रकार ये दोनों (रंग और नस्ल) मान्यताएँ परंपरा में कटुता, द्रोह, विद्रोह प्रवृति को पनपाती रही। तीसरी बार पुन: मानव को पूजा, अर्चना, योग, साधना, उपासना के आधार पर पहचानने की कोशिश हुई। यह भी पूववर्ती दो प्रकार के भूलों जैसी ही हुई। मतभेद वाद-विवाद के आधार पर पहले जैसे ही द्रोह-विद्रोह होते रहे। चौथी बार पुन: वस्तु संग्रह, सुविधा और भोग के आधार पर एक दूसरे समुदायों को पहचानने की कोशिश हुई। इसमें द्रोह-विद्रोह के साथ शोषण भी प्रखरता से शामिल हो गया। युद्घ तो पहले से ही रहा। इस प्रकार मानव विविध समुदाय प्रेरणाओं से प्रेरित होकर ही एक दूसरे को नकारने-सकारने के तरीकों से समस्याओं को तौलता ही रहा। यह समुदाय चेतना का एक इतिहास है।

(2)        शिला व धातु युग:-

दूसरा इतिहास जंगल युग के शिला युग, शिला युग से धातुयुग, धातु युग से दास युग (आदर्शवादी विचार) तथा दास युग से संघर्ष युग जो आज वर्तमान है।

शिला और जंगल में मानव प्राकृतिक प्रकोप और क्रूर जानवरों से प्रधान रूप से भयभीत ही रहा। जैसे ही कबीला एवं ग्राम युग आया वैसे ही एक समुदाय दूसरे समुदाय से भयभीत होते रहा। जैसे ही दास युग आया वैसे ही ईश्वर, राजा और गुरु के प्रति नतमस्तक होने की पंरपरा चली। राजा से प्रजा को सुख चैन का आश्वासन मिलते रहा। धर्म ग्रंथों, दर्शनों एवं विचारों के आधार पर पाप, अज्ञान, स्वार्थ से मुक्त होने के आश्वासन के आधार पर दास युग को स्वीकारा गया । इसके बावजूद द्रोह-विद्रोह-युद्घ कहीं नहीं रुका। इसके उपरान्त जैसे ही भौतिकवादी युग विज्ञान और तकनीकी पूर्वक यंत्र प्रमाण सहित आया वैसे ही संघर्ष युग का लोकव्यापीकरण होना आरंभ हुआ। इस युग की मूलभूत बात -‘‘सुविधा, संग्रह और भोग’’ है। फलस्वरुप पहले ग्राम-कबीले में मानव में निहित अमानवीयता का भय जितना रहा उससे कहीं अधिक दास युग में रहा। आज संघर्ष युग में मानव में निहित अमानवीयता का भय सर्वाधिक हो गया है। इसी के साथ प्राकृतिक भय और जीव भय इस युग में अन्य युगों की अपेक्षा कम हुआ है।

(3)        वैचारिक इतिहास

इतिहास का तीसरा चरण विचार धाराओं से शुरु होता है। यही अभी तक के प्राप्त विचारों के अनुसार ईश्वरवादी विचार है, जो प्रकारान्तर से तीन स्वरुप में मानव के सम्मुख है :-

1. अध्यात्मवाद

2. अधिदैवीवाद

3. अधिभौतिकवाद।

इन तीनों वादों को सम्मिलित रूप में आदर्शवाद नाम दिया गया है। आदर्शवाद का मूल प्रतिपादन रहस्यमूलक ईश्वर केन्द्रित चिंतन है। आदर्शवाद के अंतर्गत ऐसी रहस्यमयता को ज्ञान माना जाता है। अध्यात्मवाद वाले अध्यात्म ज्ञान को परम मानते हैं। अधिदैवीवाद वाले अधिदैवी ज्ञान को परम मानते हैं, जबकि ये सभी रहस्य हैं। इन तीनों वादों के अनुसार ज्ञान को चेतना, व्यापक और सत्य बताया गया है। मूलत: ईश्वर का प्रतिपादन अथवा सत्य का प्रतिपादन रहस्य पर आधारित होने के कारण ईश्वर भी, सत्य भी, ज्ञान भी रहस्यमय रह गया। मानव में अज्ञात को ज्ञात करने की इच्छा बनी ही रही है। फलत: इन मुद्दों पर जितने भी वांङ्गïमय तैयार हुए वे सब वाद विवाद के चंगुल में फंसते गए। इसमें प्रमुख बात यह रही है कि अनेकानेक प्रबुद्घ ईमानदार लोग सच्ची साधना में समर्पित हुए। साधनाओं की विविधता बढ़ती रही। अत: मतभेद का अनेकानेक रूप में प्रचारित होना और प्रतिबद्घित होना, देखने को मिला। इन सबके अथक प्रयास के बावजूद मूल मुद्दा रहस्य ही रहते आया। ईश्वर के नाम से रहस्यमय महिमाओं का कथन हुआ। ‘‘ईश्वर को रिझाना ही मानव जीव का कल्याणकारी मार्ग है’’- ऐसा बताया गया। इस कथन के साथ सभी अभ्यासी महापुरुष सहमत रहे। इस रहस्यवाद में अध्यात्म का आधार रहा है। इसी मूल आश्वासन के आधार पर ही अनेक लोग ईश्वर कृपा को पाकर अभिभूत अथवा तृप्त होने, समाधिस्थ होने, मौन होने अथवा बोधगम्य होने के लिए निष्ठापूर्वक प्रयत्न भी किये। ऐसे निष्ठावान तपस्वी, ऋषि, यति, सती, सन्त, मौनी महापुरुषों को सामान्य लोग यह भी मान लिये कि उन्हें ईश्वर कृपा हो चुकी। परम्परा में यह तथ्य देखने को मिलते रहा। फिर भी रहस्य ही रहता आया और अभी भी इसी प्रकार देखने को मिलता है।

इस बीच एक दूसरी विचारधारा आई, जिसको भौतिकवाद नाम दिया गया। जिसमें भौतिकता को कार्यकलाप के रूप में द्वंद्वात्मक होना प्रतिपादित किए। उसके मूल में अनिश्चय, अस्थिरता को माना गया। इस प्रकार अस्थिरता एवं अनिश्चयमूलक भौतिकवादी वांङ्गïमय मानव को मिला, जो अपने प्रभाव के रूप में तर्क संगत विधि से लाभोन्माद, कामोन्माद, भोगोन्माद के रूप में प्रज्जवलित हुआ। ईश्वरवाद के अनुसार इन तीनों प्रवृत्तियों को दुखकारी और पाप मूलक बताया गया साथ ही स्वर्ग एवं भोग को स्वीकारा और स्वर्ग-नरक को बन्धन बताया। वहीं भौतिकवाद ने इन्हीं उन्मादों को सर्वोपरि स्वीकार किया। इन्हीं प्रवृत्तियों के समर्थन में राज्य और अर्थ-नीतियों को, प्रक्रियाओं को पद्घतियों को अध्ययन कराया। इसके आधार पर एक सुविधावादी व्यवस्था की परिकल्पना सामने आई जो भोगवाद का समर्थन ही रहा।

सुविधावादी व्यवस्था का विचार भौतिकवाद का प्रसंग हुआ। इसका प्रधान कार्यरुप मानव का संग्रह की ओर प्रवृत्त होना पाया गया है। उल्लेखनीय बात यह प्रमाणित हुई कि संग्रह का तृप्ति बिंदु, किसी भी स्थिति में व किसी भी मात्रा में देखने को नहीं मिला। इस प्रकार भौतिकवाद व्यवहार रूप में संग्रह के चक्कर में फँस गया और आदर्शवाद रहस्यमय ही रह गया। इस प्रकार दोनों विचारधाराओं द्वारा व्यवहार रूप में सार्थक सुन्दर समाधान पूर्ण और सुखद सार्वभौम व्यवस्था हाथ नहीं लगी। आज की रिक्तता यही है। पहले भी यही रिक्तता रही है।

(4)        संस्कृतिक इतिहास

प्रकारान्तर से संस्कृतियों के बारे में यह मान्यता है कि संस्कृति का आधार-

1.         कपड़ो और अंलकारों की सजावट का विस्तार और उसके तरीके,

2.         शादी-ब्याह के रीति रिवाज,

3.         संतान, अन्न व वस्तुओं की प्राप्ति के साथ उत्सव मनाने का तौर तरीका,

4.         कोई मर गया तो शोक संवेदनाओं को व्यक्त करने का तौर तरीका,

5.         नृत्य, गीत-संगीत घर-द्वार की सजावट व स्वागत का तरीका।

प्रधानत: भक्ति और श्रृंगारिक प्रकृति सहज महिमाओं को आधार बनाकर व्यक्त किये हुए गीत, कविता, साहित्य, मूर्ति एवं चित्रों को संस्कृतियों का रूप मानते हुए समीक्षा करने पर शिलायुग से धातु युग, धातु युग से कबीला युग, कबीला युग से दास युग, दास युग से संघर्ष युग की संस्कृतियाँ, बेहतर से बेहतरीन मानी जा रही है।

(5)        आर्थिक इतिहास

आर्थिक इतिहास का आधार मानव परंपरा में एक आयाम हैं। इसे ऐसा भी कह सकते हैं कि अर्थ परंपरा में मानव कितना डूबते रहा और तैरते रहा। तीसरी विधि से ऐसा भी देख सकते है कि अर्थ के प्रति मानव कितना जागृत रहा या भ्रमित रहा। सबसे पहले जंगल में (आदिकाल में) जंगल को ही अर्थ मानता रहा। इसकी गवाही यही है कि आदि मानव जंगल में रहने तथा जंगल को खाने की वस्तुओं के रूप में पहचानते रहे हैं, चाहे शाकाहार करते रहे हों या मांसाहार। शिलायुग आने के उपरान्त शिला और जंगल को उपयोगी वस्तु के रूप में पहचाना। मानव के लिए उपयोगिता का स्वरुप आहार, आवास रहा ही है और अलंकार क्रम में उपयोगिता को पहचानना स्वाभाविक रहा है। जंगल युग की अलंकार प्रणाली से शिलायुग में परिवर्तन हुआ। धातु युग में और परिवर्तन हुआ। यही तीन उपयोगिता का आधार आवश्यकता के रूप में होते आया।

सम्मान योग्य व्यक्ति की पहचान जंगल युग से ही प्रारंभ हुई। क्योंकि जंगल में रहते हुए वन्य प्राणियों से जूझना एक अनिवार्य स्थिति रही। इस कारण वंश या परिवार में से अथवा समुदाय में से जो व्यक्ति क्रूर प्राणियों की हत्या कर पाया ऐसे व्यक्तियों का समुदाय या परिवार ने सम्मान किया। जैसे-जैसे आवास, अलंकार और आहार संबंधी वस्तुओं को इक_ा करने की बात आई, इसके लिए विविध प्रकार के उपायों को सोचा गया तथा उसे क्रियान्वित किया गया। इस क्रम में जब मानव प्रवृत्त हुआ तो इनमें से जो अधिक एकत्रित कर पाया वह बड़े आदमी के नाम से पहचान में आया। इस प्रकार आदिमानव काल से बड़े आदमियों (सम्मान योग्य आदमी) की दो प्रजाति इस रूप में देखने को मिली।

आदर्शवाद के अनुसार पाप, अज्ञान, स्वार्थ दूर होने का आश्वासन जिनसे भी मिला उन्हें तीसरे प्रकार से बड़ा आदमी माना गया। इनको प्राय: गुरु के नाम से इंगित व संबोधित करते रहे। इसके पहले के दो प्रजाति के आदमी में से एक राजा के पद में आय गया जो बाहुबल और युद्घ का अधिकारी बना। दूसरा संग्रह करने वाला व्यापार कार्य में भाग लेने वाला बन गया। इस प्रकार से तीन स्वरुप में बड़े आदमी को पहचानते आए।

इस बीसवीं शताब्दी के अंत तक भी उक्त तीनों प्रकार के आदमियों को बड़े मानते हैं। इन्हीं के आदर्श पर और भी बहुत सारे रूप में प्रदत्त बहुत सारी वस्तुएँ राजा के पास एकत्रित होती रहीं। राजा एवं गुरुजनों का सम्मान होते ही रहा। इसी के साथ राजाओं द्वारा अपहृत वस्तुएँ भी एकत्रित होती रही। बाहुबल के साथ राजाओं में योद्घाओं, युद्घ तंत्रों और समर साधनों के संयोग से बलपूर्वक अन्य देशों को अपने अधीन करने व वस्तुओं को लूटने की दुखद स्थिति आ गई। फलस्वरुप राजाओं के साथ संग्रह जुड़ता ही रहा और सम्मान यथावत् बना रहा। इसी के साथ व्यापारवाद लाभोन्मादी पराकाष्ठा में पहुँचने लगा। सर्वाधिक लोग इस दशक में व्यापार और नौकरी को वर्चस्वी कार्य मानने लगे हैं। इन दोनों से अधिक यदि किसी व्यक्ति के वर्चस्व को स्वीकारा जा रहा है तो वह हैं राजगद्दी में बैठा हुआ व्यक्ति अथवा बैठने योग्य व्यक्ति जो राजा का ही परिवर्तित रूप है। इस प्रकार वस्तु संग्रह के लिए तीन तबके सर्वाधिक आगे आए, वे हैं – राजगद्दी में बैठे हुए नेता या बैठने योग्य नेता, नौकरी करने वाले समुदाय और व्यापार करने वाले समुदाय। व्यापार कार्य को आज दो प्रकार से देखा जा रहा है –

1.         उत्पादन विहीन व्यापार जो उपभोक्ता और उत्पादक के बीच होने वाला महत्वपूर्ण या गौरवशाली कार्य माना जाता है।

2.         इससे अधिक गौरवशाली कार्य यदि आज मानते हैं तो वह है उत्पादन सहित व्यापार।

इस प्रकार बीसवीं शताब्दी में संग्रह करने वालों की संख्या बढ़ी। इनमें से जो राजगद्दी और व्यापार के द्वारा संग्रह करने में अभयस्त थे, वे भी इस प्रवाह के साथ हैं ही। इस क्रम में हर समुदाय राजगद्दी और धर्मगद्दी की निश्चित पहचान अपने-अपने रूप में रहती आयी। इन दोनों के बीच जो एकरुपता का सूत्र राजयुग अथवा दासयुग के प्रारंभ में स्थापित हुआ वह शनै:-शनै: परिवर्तित हो गया। आज राज्य और धर्म दोनों अलग-अलग पहचानने में आ गए हैं। इस परिवर्तन के लिए मानव मानस को जो सूत्र मिला हैं वह सब ‘‘संग्रहवादी प्रवृत्ति’’ है । आज तकनीकी और प्रौद्योगिकी की प्रधान भूमिका के कारण अत्याधिक उत्पादन हुआ हैं। अब यह भी सुनने में आ रहा हैं कि धर्म का लेन-देन या संबंध राज्य के साथ नहीं है; जबकि धार्मिक राजनीति के आरंभिक काल से ही, धर्म और राज्य एक-दूसरे के पूरक रहने की अपेक्षा बनी रही है अथवा ऐसा मान लिया गया था। दोनों में एकात्म संबंध माना गया था। विज्ञान युग के अनंतर आर्थिक राजनीति प्रभावशील हुई। आर्थिक राजनीति की पराकाष्ठा में ऐसी आवाज गूंजने लगी कि धर्म और राज्य के बीच संबंध नहीं है। इस सदी में सन् 1917 में साम्यवादी विचार के अनुसार धर्म विहीन राज्य व्यवस्था स्थापित हुई। पर सन् 1990 से साम्यवाद का उन्मूलन आरंभ हो गया। वहाँ पहले जैसे ही विविध धार्मिक आस्थाएँ पनपती हुई देखने को मिल रही हैं। इससे यह भी ज्ञानोदय होता हैं कि जब मानव अपने में सांत्वना एवं शांति चाहता है, प्रकारान्तर से धर्म का ही नाम याद आता है और आस्था का सूत्र ही उसका एकमात्र संबल होता हैं। आस्था की प्रेरणा आदर्शवाद से ही जनमानस में आई है। भय की तुलना में आस्था से आज भी राहत सी मिलती है। इसी आधार पर आस्था के केन्द्र राजा, गुरु और ईश्वर रहे। गुरु और राजा का सम्मान होते आया। आज की स्थिति में राजकाज का ढंग देखकर जनमानस की आस्था इससे टूटती गई है। आस्था का आधार हैं रहस्यमय धर्म तथा रुचि के लिए उन्माद त्रय (लाभोन्माद, कामोन्माद भोगोन्माद)।

वर्तमान समय में व्यापारी और अधिकारी समयानुसार बदलते रहते हैं। कभी व्यापारियों के चंगुल में अधिकारी तो कभी अधिकारियों के चंगुल में व्यापारी-इस तालमेल को बैठाने के कार्यक्रम में लगे दिखाई देते हैं। सम्पूर्ण अधिकारी समुदाय इस समय प्रधानत: तीन भागों में बंटे दिखाई पड़ते हैं-

1.         कार्यपालिका में प्रशासन कार्यतंत्र और सीमा सुरक्षा में,

2.         न्यायपालिका में,

3.         विधायिका में -सभी नेता विधायिका के कार्य में लगे है।

इन्हीं के साथ बहुत सारे विभाग समाहित हैं। हर विभाग में अधिकारी होता है । शिक्षा तंत्र भी एक विभाग है। यह कार्यपालिका के अंतर्गत कार्य करता है। आज सर्वाधिक अधिकारी वर्ग संग्रह कार्य में व्यस्त है। विधायिका राजनेताओं के हाथों में हैं और नेता जनादेश के आधार पर चुना जाता हैं जबकि राजा वंशानुगत होता था।

विधायिका एक बहुत बड़ा काम हैं। इसी की भागीदारी के लिए अथवा इसका कर्णधार होने के लिए नेताओं को आज आम आदमी ही पहचानकर चुनता है। उल्लेखनीय बात तो यह है कि विधायिका को आम आदमी आज नहीं जानता । नेता लोग भी ठीक से नहीं जानते। इसका ज्ञान किसे हैं नेता को या जनता को, ऐसा देखने पर दोनों अज्ञानी मिलते है। क्योंकि संविधान पर प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है। ऐसे विधायिका की नैय्या सम्हालने वाले विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा के जनप्रतिनिधि हैं। ‘‘जन प्रतिनिधित्व विधि से सम्प्रभुता वोट (मत) देते समय मानव गलती नहीं करता’’- इसीलिए जनादेश सम्प्रभुता का द्योतक है। इसी मान्यता के आधार पर गणतांत्रिक व्यवस्था प्रंारभ हुई। जहाँ-जहाँ अभी भी राजा लोग हैं वहाँ-वहाँ विधायिका का स्वामी राजा को आज भी प्रधान माना जाता है। राजतंत्र के समय की मान्यता के अनुसार राजा स्वयं ईश्वर का प्रतिनिधि हैं। ‘‘राजा कभी गलती नहीं करता-इसीलिए सम्प्रभुता राजा का स्वरुप हैं’’ – ऐसी मान्यताएँ वंशानुगत उत्तराधिकार होने को मान लेती है। इस प्रकार जन प्रतिनिधि रूप में राजगद्दी का दावेदार अथवा राज परंपरा से आया हुआ राजा, राजगद्दी में बैठा होता है। इनके लिए आम जनता का सम्मान-गौरव अर्पित होते ही रहता हैं। हर समुदाय किसी न किसी राजगद्दी में अर्पित होता ही है, चाहे वह राजतांत्रिक राजगद्दी हो या गणतांत्रिक। अस्तु, इनमें यह चीज देखने को मिली कि संग्रह कार्य इनके लिए अत्यंत आसान हो जाता है।

इस विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकला कि-

1.         आदिकाल से अभी तक वस्तु संग्रह करने वाले व्यक्तियों का अनुपात बढ़ते गया।

2.         शक्ति केन्द्रित शासन के अनुसार बंदूक, तोप, प्रक्षेपास्त्र, विस्फोट आदि वध-विध्वंश कार्यों का अधिकार संविधान विधि के अनुकूल प्रणालियों से राजा या नेता को प्रदत्त रहता है। इसे प्रत्येक शासन तंत्र में देखा जा सकता है। ऐसे शासन सम्मत अधिकार संपन्न व्यक्तियों के अतिरिक्त समर शक्तियों का उपयोग करना दूसरों के लिए अवैध माना गया हैं। इसीलिए ऐसे व्यक्ति ऐसे विध्वंशक कार्यों को करते हुए शासन तंत्र के कब्जे में न आ सकने की स्थिति में उग्रवादी, आतंकवादी आदि नामों से जाने जाते है। यह संघर्षवाद का एक स्पष्ट मूल्यांकन है।

शासन विधि, प्रणाली, प्रक्रियाओं से अधिकतर जनता उत्पीडि़त होते रही है, अभी भी उत्पीडि़त हो रही है। इससे छुटकारा पाने के लिए गणतंत्र प्रणाली को सोचा गया। इसके बावजूद उत्पीडऩ अधिक प्रसन्नता कम है। इस प्रसन्नता और अप्रसन्नता का आधार वस्तु संग्रह होने या न होने की घटना पर आधारित है।

इसी तरह एक और समुदाय है जो हमें राजयुग से ही ईश्वर के प्रति आस्था, निष्ठा स्थापित करके क्लेश-मुक्ति के लिए उपदेश देते रहे। परोपकार, असंग्रह का उपदेश देते रहे हैं। ऐसे लोगों को हम गुरु, तपस्वी, संत, यति आदि मान कर सम्मान करते रहे हैं । आम जनता आस्थापूर्वक इनके लिए वस्तु अर्पित करती रही है। ऐसे लोगों को एक वर्ग के रूप में पहचाना जा सकता है। ऐसे महापुरुषों का अध्ययन करने पर पता लगता हैं कि इनमें से कुछ लोगों को वस्तु संग्रह करना आसान हो गया हैं अथवा ये लोग वस्तुओं का संग्रह कर चुके है। पहले ये मेधावी व्यक्ति अपने तप, योग, अभ्यास, स्वाध्याय से, प्रभावशाली प्रवचनों और उपदेशों से, परोपकारी कार्यों से मनोकामना पूर्ण होने का आश्वासन देने में अग्रणी रहे। ये सब गौरव, सम्मान आदर के पात्र रहे हैं।

पहले चार समुदायों के संदर्भ में विश्लेषण पूर्वक उनकी स्थिति स्पष्ट की जा चुकी है। इनके अतिरिक्त लोगों को हम आम जनता कहते है। जिनमें पहले, आम जनता में से कुछ लोगों के पास सर्वकालीन उत्पादन कार्य हाथ में है। दूसरे कुछ लोगों के पास अर्धकालीन उत्पादन कार्य हाथ में हैं। तीसरे कुछ लोगों के पास अल्पकालीन उत्पादन कार्य हाथ में हैं। चौथे कुछ लोगों के पास कोई भी उत्पादन कार्य हाथ में नहीं है। इन चार स्वरुपों में दिखने वाली आम जनता में से उत्पादन कार्य शून्य समुदाय द्वारा अंशकालीन अर्धकालीन या पूर्णकालीन उत्पादन कार्य आज की तिथि में धनोपार्जन कार्य की ओर गतिशील होना पाया जा रहा है। इसी प्रकार अंशकालीन उत्पादन कार्य अथवा धनोपार्जन कार्य अथवा अर्धकालीन उत्पादन कार्य अथवा धनोपार्जन कार्य जिन जिन समुदायों के हाथ में हैं, वे पूर्णकालीन धनोपार्जन कार्य में व्यस्त होने के लिए गतिशील है। पूर्णकालीन उत्पादन कार्य अथवा धनोपार्जन कार्य जिनके पास हैं वे संग्रह कार्य में संलग्न होते दिखाई पड़ रहे हैं।

अभी तक के मानव के संपूर्ण इतिहास में अर्थोपार्जन और संग्रह एक प्रधान कार्य सा, लक्ष्य सा और उपलब्धि सा दिखाई पड़ता है। इसी आधार पर नेतृत्व करने वालों को देखने पर अभी तक राजनेता और धर्मनेता ही मानव समाज में दृष्टिगोचर हुए हैं। इनकी सफलता और असफलता का आधार भी एक ही है, वह है वस्तु संग्रह। इस प्रकार सफल राजनेता वही हैं जो सर्वाधिक धन संग्रह करते हैं और आम जनता को कड़ी मेहनत का पाठ पढ़ाते हैं। इसी के साथ धन संग्रह न करने की सफाई प्रस्तुत करते ही रहते हैं। दूसरे जो धर्म नेता होते हैं वे भी अपार धन संग्रह करते हैं तो भी इन लोगों के प्रति संसार के आम लोगों की आस्था बनी रहती हैं। ये लोगों को त्याग और वैराग्य का पाठ पढ़ाते रहते हैं। स्वयं अपने को परोपकारी, त्यागी और असंग्रही घोषित करते रहते हैं।

(6)        राजनैतिक इतिहास

शक्ति केन्द्रित शासन के एकाधिकार, उसकी अक्षुण्णता को, उसकी एकता-अखण्डता और प्रभाव को ‘‘राज्य’’ माना। ऐसे एकाधिकार तत्व को पहचानने गए तब मूल में ‘‘ईश्वर ही सर्वशक्ति केन्द्रित सत्ता है’’- ऐसा मान लिया गया। फलस्वरुप ईश्वर को सर्वशक्तिमान नाम भी दिया गया। जब ईश्वर को पहचाने जाने की बात आई, तब ईश्वर को मानव द्वारा पहचानना संभव नहीं हुआ क्योंकि मानव एक बहुत छोटी चीज और ईश्वर एक बहुत बड़ी चीज है। तब एक युक्ति निकल आई – वह यह कि ईश्वरीय महिमा अनुग्रह और निग्रह के रूप में है इसको हर व्यक्ति पहचान सकता है। इस प्रकार के आश्वासन को तत्कालीन विद्वानों ने तैयार किया। साथ ही लोक मानव में यह विश्वास भी स्थापित किया कि राजा ईश्वर का अवतार होता हैं और वह कभी गलती नहीं करता। इसी के साथ यह उपदेश भी दिया कि राजा, गुरु, ऋषि क्या करते हैं, यह मत देखो ये क्या कहते हैं उनको सुनो, यह उपदेश का एक तरीका स्थापित किया । इसी के आधार पर पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक की परिकल्पना और कथाओं को बताया गया। पाप और नरक के प्रति भय और पुण्य व स्वर्ग के प्रति प्रलोभन स्थापित करने के लिए परिकथाएँ निर्मित हुई। इसी आधार पर दान व परोपकार आदि के रूप में पुण्य करने के लिए उपदेश दिया गया। इसमें प्रधानत: ईश्वर को रिझाने के लिए सब पुण्य कर्म बताए गये जैसे – नमन करना, पूजा करना, प्रार्थना करना। हवा, पानी, धरती, सूरज, चाँद-तारे ये सब ईश्वर की महिमा है। इसलिए ये सब पूजा के योग्य हैं। इस प्रकार पूजा के लिए बहुत सारे आधार बनते गये। इसके आधार पर आम जनता को पुण्यार्जन का मार्ग दिखाया। पाप से मुक्ति ईश्वर कृपा से ही होने का आश्वासन दिया। राजा को ईश्वर का अवतार होना बताया गया। राजा का सम्मान और गौरव ईश्वर की पूजा है, ऐसा बताया गया। ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए राजाज्ञा का पालन करना भी पुण्य कर्मों में गण्य बताया गया। गुरु की आज्ञा, उपदेश का पालन, शिक्षा ग्रहण ये सब पुण्य के साक्षात स्वरुप ही कहे गये। अर्थात् इन्हें पुण्य का प्रमाण माना गया। इस प्रकार से पुण्य के लिए बताये गये अथवा पुण्य मिलने के लिए जो तरीके बताये गए उसका पालन करने वाले को पुण्यात्मा मान लिया गया। इसके विपरीत जो कुछ भी किया उनको पापात्मा मान लिया गया। इसी के आधार पर धार्मिक दंडनीति तैयार हुई। पाप का दण्ड, दमन, प्रायश्चित बताए गए। धर्मार्जन कार्यों में लगे रहना ही सदाचरण माना गया। इसी क्रम में समुदाय गत कार्यकलापों के आधार पर जो-जो धर्म-कर्म करते रहे हैं उनके लिए पाप-पुण्य के आधार पर सुधर्मो को बताया गया। इस प्रकार प्रत्येक संविधान में अर्थात् राज्यकाल में अर्थात् कबीला युग, ग्राम युग में अंतरित होने के समय में विभिन्न समुदायों के बीच में संविधान बने और स्थापित हुए। कुछ लिखित और कुछ अलिखित, दोनों प्रकार के संविधान चलते आये। ईश्वर राजा और गुरु के प्रति आस्था और निष्ठा स्थापित करना ही प्रधान कार्य रहा। पाप-पुण्य के आधार पर दण्ड और न्याय निर्णय करने का अधिकार राजा अथवा राजा से अधिकृत व्यक्तियों को रहा। इस क्रम में संविधानों में यह भी देखने को मिला बहिष्कार को भी एक दण्ड के रूप में प्रयोग किया गया। रहस्यमय पुण्य घटनाक्रम में दिखने वाले अपराधों के आधार पर धार्मिक राजनीति की स्थापनाएँ हुई। ऐसी स्थापनाएँ इस धरती पर कई समुदायों के बीच हुई। आज भी विभिन्न समुदायों के बीच भिन्नता सहित संविधानों का स्वरुप देखने को मिलता है।

धार्मिक राजनीति के काल में ही दास युग की स्थापना हुई। इसमें ईश्वर के प्रति दासता, गुरु के प्रति दासता और राजा के प्रति दासता को स्वीकारने की परम्परा बनी। इसी दासता को दूसरी भाषा में समर्पण कहा गया। उसके फलस्वरुप अधिकांश मानव जाति सशंकित, आतंकित रही।

क्रमागत विधि से मानव मानस के परिवर्तनों के आधार पर मानव से घटित होने वाली घटनाएँ बदलती भी रही। जैसे सत्ता परिवर्तन, वस्तु संचय का परिवर्तन, अपहरण, लूट, उपकार, द्रोह-विद्रोह, युद्घ, व्यापार, शिक्षा, व्यवस्था तंत्र, संस्कार तंत्र, विपन्नता से संपन्नता की ओर बढऩे के क्रम में हर परिवार व हर व्यक्ति प्रयत्न करता ही आया।

अनुमानत: दो सौ वर्ष पूर्व विज्ञान युग या भौतिकवादी युग आरंभ हुआ। विज्ञान का विरोध धर्मतंत्र ने जमकर किया। अंततोगत्वा वैज्ञानिकों ने राजगद्दी को अपने पक्ष में कर लिया। इस आधार पर कि राजा को सदा ही युद्घ से जूझने की आवश्यकता पड़ी। धर्म के सहारे युद्घ भय से राहत मिलना संभव नहीं रहा। इसके विपरीत यह मान लिया गया कि धर्म का संरक्षण युद्घ में कुशल होने पर होगा। कुछ धर्म वाले अथवा कुछ धार्मिक राज्य वाले धर्म संरक्षण के लिए युद्घ को प्रधान कार्यक्रम मान लिये थे। इन्हीं आधारों पर तत्कालीन राजगद्दी वाले विज्ञान के द्वारा समर शक्ति पैनी होगी इस संभावना पर विश्वास किए। फलस्वरुप विज्ञान को राज्याश्रय मिलना आरंभ हुआ। आज भी सर्वाधिक समर शक्ति संपन्न देशों को ही विकसित देश मानते हैं। यही आज के मूल्यांकन का आधार है। इस जगह को आज विश्व संघ या राष्टï्रसंघ कह रहे हैं। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता हैं कि आज तक मूल्यांकन किसी देश की समर शक्ति संपन्नता और वस्तु संग्रह के आधार पर ही किया जाता है।

राजनैतिक इतिहास में उल्लेखनीय बात यह है कि सबसे पहले ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानते हुए शक्ति केन्द्रित शासन की कल्पना दी गई। तत्कालीन तथाकथित ज्ञानियों, बुद्घिजीवियों से ऐसा ही करना बन पाया। इस परिकल्पना का मूल रूप ‘‘ईश्वर स्वयं रहस्य ही रहा।’’ ऐसी रहस्यमयी मान्यता का आधार केवल मानव की कल्पनाशीलता व कर्म स्वतंत्रता ही रही। रहस्यमय ईश्वर और मानव की कल्पनाशीलता केे साथ आस्था सूत्र को मिलाकर सम्पूर्ण ताना-बाना बन गया। इससे मानव कुल दुविधाओं का सामना करता ही आया। दूसरा, जैसे ही विज्ञान युग आया पुण्य से स्वर्ग में मिलने वाली वर्णित सभी प्रकार के पुण्य भोग गली-गली में, बाजारों में, प्रासादों में, भवनों में, झोपडि़यों में, मैदानों और सडक़ों में खुले आम मिलने लगा। पहले से पुण्य भोग के रूप में भोग लिप्सा को पैदा किये ही थे। इस भूमिका को सभी प्रकार के धर्म ग्रन्थों ने पूरा कर लिया था; इसलिए इंतजार के बिना (अर्थात् मरने के बाद स्वर्ग में बढि़या विविध भोग मिलेंगे तब तक इंतजार करो) तत्काल नगद मिलने वाले भोगों के प्रति लोक मानस लपककर उत्सुक हुआ। इसमें यह भी पहलू उभर आया कि जितनी बातों के लिए धार्मिक राजनीति में मना किया गया और उसे ‘पाप’ कहा गया जैसे चोरी-बदमाशी, लूट-खसोट, शोषण-संग्रह, इसी ‘पाप’ को करने वाले विज्ञान युग में सभी भोगों को नगद पा लिए।

आज की स्थिति यही है कि परस्पर सभी संबंधों में धन को प्रधान मान लिया गया। फलत: धन के लिए प्रयास देखा जा रहा है। यह भी देखने को मिला कि शुद्घ पानी व शुद्घ हवा के लिए भी पैसा चाहिए। इस प्रकार शरीर यात्रा के हर पहलू में पैसा प्रधान हो गया। फलस्वरुप सभी प्रकार के राजतंत्र आर्थिक राजनीति में अन्तरित हो गये।

इस संघर्ष युग में ‘‘धार्मिक राजनीति’’ का पराभव हुआ और ‘‘आर्थिक राजनीति’’ की पराकाष्ठा हुई। इसमें एक और निष्कर्ष निकल कर आता हैं कि इस आर्थिक राजनीति संघर्ष युग और गणतंत्र प्रणाली के चलते शासन की संभावनाएँ टूट चुकी हैं। शासन की बुनियाद रहस्यमय होने से, राजगद्दी में बैठे हुए व्यक्ति के रहस्योद्घाटन हो जाने से ईश्वर स्वयं न तो किसी को मारने दौड़ता हैं न ही बचाने दौड़ता हैं – यह स्पष्ट हो जाने से तथा हर व्यक्ति संग्रह का उम्मीदवार होने से शासन की बुनियाद ही हिल चुकी हैं। अस्तु, इसका विकल्प समाधान युग का आरंभ होना है, जो स्वयं व्यवस्था के रूप में पल्लवित, पुष्पित व फलित होगा ही।

(7)        धार्मिक इतिहास

विगत के अवलोकन से यह पता चलता हैं कि राजगद्दी के साथ धर्मगद्दी और धर्मगद्दी के साथ राजगद्दी ओत-प्रोत रहे हैं तथा एक-दूसरे के साथ शासन और नीति के आधार पर तालमेल बनाये रखने के मौलिक प्रयास रहे हैं यह लिखित इतिहासों से स्पष्ट होता हैं । धर्म का मूल तत्व ईश्वर, आत्मा, ईश्वर वाक्य, ईश्वर आज्ञा हैं- ऐसा माना गया हैं । जबकि ईश्वर अभी तक रहस्यमय है अथवा रहस्य में छुपा हुआ है। ये सब ईश्वर आज्ञाएँ ईश्वरवाणी के रूप में, कितने ही मूल ग्रंथों में, पावन ग्रंथों में, कितने ही समुदायों में माना गया हैं। जितने भी प्रकार की ईश्वर वाणियाँ अनेकानेक ग्रंथों में हैं; वे सब एक रूप, एक अर्थ प्रतिपादित करने वाले नहीं हैं। इस कारण कोई पावन ग्रंथ सार्वभौम नहीं हो पाया। कोई भी ऐसा पावन ग्रंथ अध्यवसायिक विधि से अर्थात् रहस्य विहीन यर्थाथता, सत्यता, वास्तविकता पूर्ण पद्घति, प्रणाली, नीति सम्मत विधि से उसे अध्ययनगम्य नहीं करा पाया। पहले ही ईश्वर रहस्यमय रहा। रहस्य पर आधारित सभी पावन ग्रंथ एक-दूसरे से असहमत हुए। फलस्वरुप वाद विवाद हुआ जिसकी अंतिम परिणति झगड़ा और युद्घ के रूप में हुई। युद्घ के लिए राजाश्रय की आवश्यकता रहा। इस प्रकार पावन ग्रंथ रुपी धर्म-संविधान भी वाद-विवाद का केन्द्र बना। हर आदमी किसी न किसी धर्म संविधान और राज्य संविधान में अर्पित होते ही आया। धर्म तथा राज्य संविधान भिन्न भिन्न रहे। इसका फल यही निकला कि हर व्यक्ति दूसरे किसी पावन ग्रंथ को अथवा धर्म संविधान को मानने वाले के साथ वाद विवाद करते रहा। यही एक मात्र धार्मिक कार्य हो गया। इस विधि से हर व्यक्ति अपने-पराये की दीवाल बनाने वाला शिल्पी हो गया।

फलस्वरुप सामान्य जन मानस अपने-पराये की मानसिकता के साथ जीने को बाध्य हुआ। इसी मानसिकता के साथ जब-तब दूसरे धर्म संविधानों को अनुसरण करने वालों के साथ झड़प होते ही रही। आदमी आदमी को मारने के लिए, वध करने के लिए अपने पराये के आधार पर मानसिकता को तैयार करते आया। आज भी इस प्रकार की घटनाएँ बारम्बार देखने को मिल रही हैं। इस अपने पराये की दीवाल बनाने के धंधे में सारा राज्य प्रबंध (संविधान), संपूर्ण पावन धर्म संविधान सिमट गया। अब एक ही धंधा सभी समुदायों के साथ बचा हैं वह है एक दूसरे समुदाय को कैसे मिटाए। इसके अलावा और कोई चिंतन मानव मानस में जीता जागता दिखता नहीं है। इसी के साथ संग्रह भी समाया हैं। विकसित देश की समीक्षा समर शक्ति के आधार पर ही विश्व स्तरीय संस्थाओं में हो चुकी हैं अब धर्म कहलाने वाले आधारों पर भी मारपीट ही एक मात्र कार्यक्रम रह गया है। इसके लिए भी बहुत सारा धन चाहिए ही। उसके लिए अनेक प्रकार से धन संचय करने का अनुसंधान भी कर लिया गया हैं। इस अनुसंधान की समीक्षा अर्थात् धन संचय की समीक्षा शोषण, द्रोह, लूट-खसोट की चौखट में स्पष्ट है। यह तो सिद्घांत ही है कि किसी का शोषण किये बिना धन संचय नहीं होता। इस क्रम में मानव अपनी संपूर्ण शक्तियों अर्थात् कल्पनाशीलता, कर्म स्वतंत्रता, विचारशीलता जैसी मौलिक शक्तियों को दाँव पर लगा चुका है। यह मौलिक इस प्रकार से हैं कि केवल मानव में ही कर्मस्वतंत्रता कल्पनाशीलता और विचारशीलता पाई जाती हैं। तथा प्रत्येक मानव व्यवहार प्रयोग में इसे प्रमाणित करता है। और किसी अवस्था में अर्थात् पदार्थावस्था, प्राणावस्था व जीवावस्था में ऐसे प्रयोग व्यवहार नहीं दिख पड़ते हैं। इसीलिए मानव में यह प्रमाणित होना मौलिक है। इस प्रमाण से मानव में अक्षय शक्ति का होना प्रमाणित होता है।

आर्थिक और राजनैतिक संचेतना के आधार पर मानव संघर्षशील है ही। धार्मिक चेतना अर्थात् धार्मिक ज्ञान अथवा धर्म कहलाने वाले ज्ञान कम से कम कल्पनाशीलता और विचारशीलता के रूप में कर्म स्वतंत्रता के आधार पर जितना और जैसा प्रमाणित होता हैं, उतने के आधार पर धर्म कहलाने वाले सभी मुद्दे संघर्ष में घिर आए। स्पष्ट भाषा में सभी प्रकार के धर्म कहलाने वाले सभी मुद्दे संघर्ष के गिरफ्त में हो गए। अर्थात् सभी प्रकार के धार्मिक कहलाने वाले मानव अथवा विविध प्रकार के धर्म का नाम लेने वाले मानव संघर्ष के लिए बाध्य हो गये। सभी धर्मों के मूल में प्रतिपादित पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक से आस्था घट गई। साथ ही संघर्ष और भोग लिप्सा प्रज्जवलित होती ही गई। इन्हीं कारणों से संघर्ष को अपनाया गया। आज की स्थिति में तथाकथित धर्म का डूबना एक अनिवार्य स्थिति बन चुकी है।

ध्यान देने का बात यह है कि व्यक्ति के रूप में प्रत्येक मानव सुख शांति चाहता भी हैं और इसे कहता भी हैं। जब वही आदमी किसी तथाकथित धर्म, संप्रदाय, मत, पंथ, रुढि़यों के आधार पर बात करता है तब ‘‘और अधिक संग्रह’’ और ‘‘भोगवादी कार्यकलाप’’ के संबंध में जब बोलता हैं, तब अपने-पराए की दीवाल बनाता ही है। सुख शांति के संबंध में कुछ भी बात करता है, कितनी भी बातें करता हैं, तब अपने -पराये की दीवाल नहीं बन पाता है। अपितु सुख शांति की अपेक्षा सभी मानवों में हैं, इसे स्वीकारता है। ऐतिहासिक विरोधाभास यही है कि सभी धर्म परंपराएँ सुख शांति को ध्यान में रखते हुए धर्म परंपराओं को आरंभ करती हैं। हर पावन ग्रंथ की यही मंशा है। इतना ही नहीं हर राज्य संविधान की मंशा भी यही हैं । किसी उस धर्म और राज्य के पक्ष में जिसमें वह समर्पित है जब आदमी बात करता हैं तब विरोधात्मक दीवाल चुनता ही है फलत: अपने पराये के भेद बन ही जाते है। जबकि व्यक्ति कोई पावन ग्रंथ नहीं हैं। सामान्य व्यक्ति के रूप में जब वह प्रस्तुत होता हैं तब उनको सुख शांति की आवश्यकता सभी मानवों में समान रूप में दिखाई पड़ती है। इससे स्पष्ट होता है कि धर्म ग्रंथों के प्रभाव के बिना जब मानव होता हैं तब उनकी कल्पनाशीलता और विचारशीलता विशालता की ओर दौड़ती दिखाई पड़ती है। वही व्यक्ति जब किसी धार्मिक ग्रंथ के दायरे में आ जाता है तब उसी व्यक्ति में पाई जाने वाली कल्पनाशीलता और विचारशीलता संकीर्ण होते हुए देखने को मिलती है। इस तथ्य के आधार पर विश्व मानव ऐसा एक सद्बुद्घि का प्रयोग कर सकता हैं मानव सहज अपेक्षा रुपी सुख शांति सबके लिए सुलभ हो ऐसा निश्चय कर सकता है। तब विविध समुदायों में मान्य, सभी पावन ग्रंथों को सार्वभौम लक्ष्य के आधार पर पुनर्विचार कर सकता है।

सुख-शांति के प्रमाण हैं समाधान, समृद्घि, अभय, सहअस्तित्व। इस आधार पर सुख-शांति को पहचान सकते हैं और मूल्याँकन कर सकते हैं। इस विधि से देखें तब संभव है कि सब में एक सामरस्यात्मक सूत्र निकल जाये। यदि नहीं निकलता है तब अस्तित्व को परम शक्ति के रूप में स्वीकारते हुए- मानव चिंतन करने वाला हैं – सुख शांति को जानने मानने वाला है- यह स्वीकार करते हुए- अनुसंधान कर सकते है। ऐसा अनुसंधान मैंने किया है। इसी के आधार पर कि अस्तित्व परम सत्य है व मानव दृष्टा ज्ञाता व कत्र्ता-भोक्ता है। सह-अस्तित्व दर्शन और उसका अध्ययन सुलभ हो गया है। मानव, शरीर और जीवन के संयुक्त साकार रूप में है। जीवन का अध्ययन जीवन स्वयं करता हैं अर्थात् मानव करता है। जीवन ही जीवन का दृष्टा है, जीवन ही अस्तित्व में दृष्टा है और जीवन ही शरीर का दृष्टा है। इस तथ्य को जीवन ज्ञान से जानना मानना संभव हो गया है। इसलिए जीवन ज्ञान परम ज्ञान है। सह-अस्तित्व दर्शन ही परम दर्शन है। इन दोनों के योगफल में मानवत्व सहित मानव अपने में व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है- इसका प्रमाण हृदयंगम होता हैं। इसलिए मानवीयतापूर्ण आचरण ही परिपूर्ण आचरण हैं। यह अध्ययन सुलभ हो चुका हैं। इससे हम संघर्ष युग से समाधान युग में संक्रमित होने की सहज दिशा, मार्ग, प्रक्रिया, पद्घति, नीति और प्रणाली पा सकते हैं। सभी मानवों को इसे (मानवीयता) जानने, मानने और पहचानने का अधिकार है- यही इसे मानव में स्थापित करता है। इसका परीक्षण किया जा सकता है।

सह-अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन ज्ञान ‘‘मध्यस्थ दर्शन’’ के रूप में प्रस्तुत हैं। ‘‘अस्तित्व स्वयं सह-अस्तित्व है’’ यह प्रतिपादित और विश्लेषित है, फलस्वरुप सह-अस्तित्ववाद अपने आप अभिव्यक्त और संप्रेषित हुआ है। सह-अस्तित्ववाद ही मानव वाद है। मानववाद ही मूलत: मानव में, से, के लिए सार्थक है और सहज है। मानव की सार्थकता व्यवहार में प्रणाणित होना ही सार्वभौमिकता का आधार है।

मानव मूलत: परिवार मानव हैं। अकेले में कोई कार्य और कार्य योजना नहीं बन पाती है। मानव के लिए मानव और मानवेतर प्रकृति नैसर्गिकता और वातावरण है। इतना ही नहीं, ‘‘अस्तित्व ही सत्ता में संपृक्त प्रकृति के रूप में सहअस्तित्व है और नित्य वर्तमान है।’’ इन्हीं तथ्यों के आधार पर समाधानात्मक भौतिकवाद, व्यवहारात्मक जनवाद और अनुभवात्मक अध्यात्मवाद मानवकुल के लिए अर्पित हुआ है।

मानव सहज रूप में ही प्रयोग, व्यवहार और अनुभव रुपी प्रमाणों के साथ जीना चाहता है। सर्वतोमुखी समाधान पाना चाहता है अर्थात् विविध आयाम, कोण, दिशा, परिप्रेक्ष्य, देशकाल में समाधान पाना चाहता है। इस आश्य की पुष्टि प्रत्येक मानव में सभी देश काल में प्रकारान्तर से होती हैं । इसलिए द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के स्थान पर समाधानात्मक भौतिकवाद को मानव के सम्मुख प्रस्तावित किया। विश्वास है- मानव कुल अपनावेगा। इसे अपने ही स्वत्व के रूप में पहचानेगा, स्वीकारेगा और प्रयोजनशील हो जाएगा।

Madhyasth Darshan