View, Seen, Vision (दृष्टी, दृश्य और दर्शन)

 

दर्शन-दृश्य-दृष्टि

*स्त्रोत = मानव व्यवहार दर्शन, संस २००९, अध्याय ९ 

●    दर्शन के लिये दर्शक, दृश्य और दृष्टि का रहना अनिवार्य है ।

::    दर्शन :-न्याय धर्म-सत्य सहज दृष्टि द्वारा की गई क्रिया-प्रक्रिया की दर्शन संज्ञा है।

●    दर्शक की क्षमता, दृष्टि के परिमार्जन के योग से दृश्य के साथ दर्शन क्रिया है । जो जैसा है, उसको वैसा ही समझने की क्षमता, उसे वैसा ही देखने की प्रक्रिया के योग से दर्शन क्रिया है ।

●    दर्शन के भेद से लक्ष्य भेद है, क्योंकि जो जैसा जिसका दर्शन करता है, उसके अनुसार उसके साथ जो अर्थ है, उसको लक्ष्य स्वीकारता है । यह मूल्यांकन क्रिया भ्रम और जागृति को स्पष्ट करता है ।

●    वातावरण, अध्ययन, पूर्व संस्कारों के अनुबन्धानुक्रम विधि से दर्शन क्षमता, योग्यता एवम् पात्रता है । क्षमता, योग्यता एवम् पात्रता के अनुसार ही जागृति एवम् ह्रास की ओर गति है ।

●    दृष्टि द्वारा प्राप्त समझ व्यंजना पूर्वक स्वीकृति को दर्शन संज्ञा है ।

●    प्राकृतिक एवम् मानवकृत भेद से वातावरण है ।

●    शा, इतिहास एवम् काव्य भेद से अध्ययन है ।

●    वंशानुगत अध्यास, विधि विहित तथा विधि हीन भेद से प्रयोग है।

●    रचना-विरचना पर्यन्त की प्रकृति संज्ञा है एवम् वर्तमान से पहले जिसका निर्माण हो चुका है, उसका अध्ययन तथा भविष्य में जिसके निर्माण की सम्भावना है, उसका अनुमान मानव ने किया है। सम्पूर्ण रचना को प्रकृति संज्ञा है ।

::    शा :- निर्दिष्ट लक्ष्योन्मुख सिद्घान्त-प्रक्रिया एवम् नियम तथा वस्तुस्थिति का निर्देशपूर्वक बोध कराने वाले शब्द व्यूह की शा संज्ञा है ।

●    नियम और प्रक्रिया फल का संयुक्त प्रमाण ही सिद्घान्त है, क्योंकि नियम एवम् प्रक्रिया समाधान के अभाव में किसी भी क्रिया फल का दर्शन सिद्घ नहीं है । क्रिया के नियम एवम् प्रक्रिया के बोध से ही वैचारिक परिमार्जन समाधान सम्भव हो सका है ।

::    काव्य :-  इकाई के भाव, विचार एवम् कल्पना जो मानव लक्ष्य के अर्थ में हो, को दूसरों तक प्रसारित करने हेतु प्रयुक्त शब्द व्यूह की काव्य संज्ञा है ।

::    इतिहास :-  विगत की जागृत मानव और मानवीय  कृतियों एवम् घटनाओं के श्रृं९लाबद्घ क्रम के स्मरणार्थ प्रस्तुत भाषा या शब्द राशि की इतिहास संज्ञा है ।

::    भूगोल :-मानव और मानवीयता के अर्थ में पृथ्वी का सर्वेक्षण, निरीक्षणपूर्वक मानचित्र सहित रचना ज्ञान पाने के लिये सम्पादित अध्ययन की भूगोल संज्ञा है ।

::    सुसंस्कृत संस्कार :-   विधि मानव चेतना, देव चेतना एवम् दिव्य चेतना क्रम में है । विधि में जो विश्वास है, उसकी सुसंस्कृत सुसंस्कार संज्ञा है ।

●    मानवीयतापूर्ण प्रवृत्ति एवम् व्यवहार की न्याय तथा अमानवीयतापूर्ण प्रवृत्ति एवम् व्यवहार की अन्याय संज्ञा है ।

●    यथार्थ जानकारी के पश्चात उसके प्रति उत्पन्न दृढ़ता की विश्वास संज्ञा है ।

::    न्यायपूर्वक की गई कृति की सुकृति तथा अन्यायपूर्वक की गई कृति की दुष्कृति संज्ञा है ।

●    मानवीयता के लिये आवश्यक नियम ही न्याय है, जिससे ही मानवीयता का संरक्षण एवम् संवर्धन सिद्घ है ।

●    मानव के व्यवहार का नियंत्रण न्याय से, वैचारिक संयमता धर्म से तथा अनुभव मात्र सत्य से सम्पन्न है ।

●    नियम से ही नियंत्रण है । स्वीकारने योग्य लक्ष्य से ही धारणा है एवम् नित्य वर्तमान ही सत्य है ।

●    मानव ने स्वीकारने योग्य तथ्य एवम् लक्ष्य सुख को जन्म से ही स्वीकार कर लिया है । यह जीवन लक्ष्य है । यह मानव लक्ष्य रूपी समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व सहज है ।

●    स्थूल व सूक्ष्म भेद से ही विकृति अथवा सुकृति है । विज्ञान व विवेक के अध्ययन एवम् प्रयोग से ही मानवीय जागृति है ।

●    जागृति व ह्रास द्वारा ही मानव का मनाकार साकार होता है ।

●    आसक्ति एवम् अनासक्ति भेद से ही मानव की मन: स्वस्थता की आशाएँ हैं ।

●    यह आशाएँ मोक्ष, स्वर्ग के रूप में कामना; अर्थ एवम् काम के रूप में प्रलोभन, प्रत्याशा भेद से दर्शन (शा); स्वीकृत व अनुकृत भेद से काव्य; जिस कार्य, विचार व व्यवहार से क्लेशोदय हो वह निषेध तथा जिससे सुखोदय होता है, वह विधि के रूप में स्वीकारी जाती है ।

●    प्राकृतिक एवम् कृत्रिम वातावरण मानव के लिए अनुकूल या प्रतिकूल होता है ।

●    मानव में आशाएँ मानवीय, अमानवीय व अतिमानवीय अवस्था भेद से हैं ।

●    प्रवृत्ति व निवृत्ति बंधन एवम् मोक्ष के स्पष्टीकरण भेद से शा, विहिताविहित भेद से आशाएँ, विचार, इच्छा एवम् संकल्प है, जिसकी विवेचना, अध्ययन व प्रयोग करने का अवकाश एवम् अवसर केवल मानव में है ।

●    जड़ वस्तु में मात्रा, गति पाई जाती है ।

●    समस्त जड़ क्रिया में परमाणु को क्रियाशील पाया जाता है । परमाणुएं समूह के रूप में अथवा संगठित रूप में क्रियाशील मध्यांश तथा आश्रित अंशों सहित क्रिया के रूप में परिलक्षित होता है । इसलिए ज्ञात होता है कि जड़ पदार्थ में क्रियाशीलता स्वतंत्र है ।

●    जब एक परमाणु विकासपूर्वक चैतन्य हो जाता है, उसी समय से जीने की आशा बन्धन स्वरूप पाई जाती है । यह इससे सिद्घ होता है कि हर जीव जीना चाहता है ।

●    मानव बुद्घिजीवी होने के कारण, जीवित रहकर विचार, इच्छा, अहंकार तथा संकल्प का प्रयोग वृत्ति, चित्त तथा बुद्घि द्वारा करता है ।

●    वृत्ति का बंधन, भ्रमित विचार का बन्धन है, जो स्वविचार को श्रेष्ठ मानने से है तथा इससे अमानवीय  विचार का प्रसव होता है क्योंकि मानव कल्पनाशील है ।

●    न्याय पूर्ण विचार से वैचारिक बन्धन से मुक्ति है ।

●    चित्त का बन्धन इच्छा का बन्धन है, जो स्वयं द्वारा किए गए चित्रण को भ्रमवश चिन्तन मानने से होता है । इससे अमानवीयता का पोषण तथा चिन्ता का जन्म होता है ।

●    धर्म पूर्ण चिन्तन से अथवा चित्रण से इच्छा बन्धन से मुक्ति होती है ।

●    भ्रमित बुद्घि अर्थात् मान्यता पूर्वक चित्रण क्रिया से स्वयं को श्रेष्ठ मानने से इच्छा बन्धन होता है । यही अभिमान है ।

●    सत्य बोध से परिपूर्ण संकल्प से भ्रम मुक्ति होती है ।

●    लोकासक्ति से (जड़ पक्ष से) दु:ख समस्या तथा आत्मबोध से सहज सुख की निरन्तरता है ।

●    लोक परिणाम वादी है, अत: उसका सुख भी क्षणिक है । इसलिए लोकासक्ति बन्धन का कारण है।

●    आत्मबोध अमर है या अपरिणामी है, इसलिए आत्मबोध का सुख शाश्वत है । आत्मबोध का तात्पर्य अनुभव बोध से है ।

●    अत: यह सिद्घ होता है कि जिसमें सुख की निरन्तरता नहीं है, उसी में सुख पाने का प्रयास ही बन्धन है तथा जिसमें सुख स्वभाव है उसका अनुभव ही मोक्ष है ।

●    भ्रमित इच्छा की पूर्ति के लिए क्रिया तथा क्रिया की पूर्ति के लिए भ्रमित इच्छा व्यस्त है, जिसकी पूर्ति नहीं है । अर्थात् भ्रमित इच्छा एवम् क्रिया के सम्मिलित स्वरूप की ‘लोक’ संज्ञा है ।

●    जिसकी पूर्ति नहीं है, जो पूर्ण नहीं है, उसकी पूर्ति के प्रति और पूर्णता के प्रति जो हठवादी इच्छाएं हैं उसकी ‘मृगतृष्णा’ तथा भ्रान्ति संज्ञा है, जो बन्धन है ।

●    मृगतृष्णा अथवा भ्रान्ति का निराकरण सह अस्तित्ववादी अनुभव दर्शन से ही प्रमाणित है ।

●    सह अस्तित्व में ही इकाई का दर्शन, अनुभव है और इसके लिए इकाई के रूप, गुण, स्वभाव और धर्म का अध्ययन अत्यंत अनिवार्य है ।

●    संपूर्ण सृष्टि का कुल अध्ययन जड़, चैतन्य तथा व्यापकता के संदर्भ में ही है । यही भौतिक, रासायनिक एवं जीवन क्रिया के रूप में स्पष्ट है ।

●    संपूर्ण सृष्टि का अध्ययन मानव ने कुल छ: दृष्टिकोणों से किया है:-

(_) प्रियाप्रिय, (_) हिताहित, (_) लाभालाभ, (_) न्यायान्याय, (‘) धर्माधर्म और (_) सत्यासत्य।

●    सुखाकाँक्षा से आशय, आशय से आवश्यकता, आवश्यकता से अध्ययन, अध्ययन से क्षमता, क्षमता से दृष्टि, दृष्टि से दर्शन तथा दर्शन से स्पष्टीकरण, स्पष्टीकरण से निश्चित योजना है ।

●    मानव में अर्थ तथा काम के प्रलोभन से ही प्रियाप्रिय, हिताहित तथा  लाभालाभ दृष्टियाँ क्रियाशील है, साथ ही धर्म तथा मोक्ष के संकल्पों से न्यायान्याय, धर्माधर्म तथा सत्यासत्य दृष्टियाँ क्रियाशील हैं। भ्रम मुक्ति ही मोक्ष है ।

●    मानवीयता तथा अतिमानवीयता से समृद्घ होने के लिए मोक्ष व धर्म प्रमाणित होना आवश्यक है ।

●    भ्रमवश प्राप्ति के लिए की गई प्रारंभिक तैयारी ही प्रलोभन है । सार्थक प्राप्ति के सम्भावनात्मक विचारों की आशय, जिसकी उपलब्धि के बिना तृप्ति सम्भव न हो उसे आवश्यकता की संज्ञा है।

●    अधिष्ठान (आत्मा) की साक्षी में स्मरणपूर्वक किए गए प्रयास को अध्ययन, जो जितने योग्यता से सम्पन्न है, वह उसकी क्षमता का बल और शक्ति के रूप में प्रकाशन है । सभी मानव जीवन में क्षमता समान है । क्षमता द्वारा की गई अभिव्यक्ति को दृष्टि, और दृष्टि में होने वाले प्रतिबिम्बन क्रिया को दर्शन की संज्ञा है । प्रतिबिम्बन का तात्पर्य समझने से है ।

●    सह-अस्तित्व ही सम्पूर्ण दृश्य है ।

●    दृश्य का दर्शन व्यापक वस्तु में सम्पृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति सहज रूप में विद्यमान सत्ता में अनुभव ही ज्ञानावस्था की इकाई के पूर्ण जागृति का द्योतक है ।

●    लोक तृष्णा से त्रस्त एवम् इसमें व्यस्त समस्त प्रयत्नों में मानव को श्रम की पीड़ा की ही उपलब्धि है, यही भ्रम है । इसीलिये मानव ने श्रम की पीड़ा से मुक्त होने का यत्न भी किया है, जो मानव की क्षमता, योग्यता एवम् पात्रता के अनुसार सफल अथवा असफल हुआ है ।

●    मानव ने अमानवीयता, मानवीयता और अतिमानवीयता का अध्ययन करने का प्रयास किया है । उपरोक्त तीनों दृष्टि, स्वभाव एवम् विषय का वर्णन पूर्व अध्याओं में किया जा चुका है ।

●    सह-अस्तित्व में दर्शन ही ज्ञान है, ज्ञान ही नियम है तथा नियम ही नियन्त्रण है, जिसको अस्तित्व में पाया जाता है ।

●    हर क्रिया नियम से नियन्त्रित है ।

●    विषयी, विषय तथा विषय-वस्तु यह तीनों क्रियाएँ हैं ।

●    जड़ क्रिया को पाकर किए गए श्रम से, विश्राम की प्रतीक्षा एवम् प्रयास मानव ने किया है, जो असफल सिद्घ हुआ है । इसके साथ ही व्यवहारिक एवम् वैचारिक एक-सूत्रता पूर्वक सह-अस्तित्व भी सिद्घ हुआ है, जो नियम एवम् व्यापकता सहज महिमा है ।

●    समस्त क्रियाएं शून्य में नियन्त्रित तथा संरक्षित है । क्योंकि इकाई और इकाई के बीच शून्य का अभाव नहीं है । इसलिये शून्य ही नियम एवम् नियंत्रण का कारण सिद्घ हुआ है । इसी के भास, आभास एवम् अनुभूति के योग्य क्षमता, योग्यता एवम् पात्रता से सम्पन्न होने के लिए ही मानव ने अनवरत प्रयास विभिन्न स्तरों पर किया है, कर रहा है और करता रहेगा ।

●    उक्त प्रयास के मूल में क्षमता, क्षमता के मूल में अध्ययन, अध्ययन के मूल में पात्रता, पात्रता के मूल में योग्यता, योग्यता के मूल में कर्माभ्यास, कर्माभ्यास के मूल में साधन, साधन के मूल में एकसूत्रता, एकसूत्रता के मूल में प्रयास हर मानव इकाई में अपनी-अपनी अवस्था और जागृति अनुसार होना पाया जाता है।

●    परस्पर समाधान के अर्थ में क्रिया व संकेत ग्रहण सहित अनुसरण क्रिया ही ‘एकसूत्रता’ है ।

●    स्पष्टतापूर्वक प्रसारित संकेतानुसरण से ही एकसूत्रता व जागृति है, अन्यथा भ्रम व ह्रास है ।

●    भ्रमित व्यक्ति के द्वारा, भ्रमित  व्यक्ति को संबोधन एवं अमानवीय शिक्षापूर्वक जागृति को प्रमाणित करना संभव नहीं है । जागृत व्यक्ति के द्वारा ही भ्रमित व्यक्ति को जागृति के लिए मार्ग प्रशस्त करना प्रमाणित होता है और यही स्वयं में जागृति का प्रमाण है ।

●    हर इकाई अनन्त की तुलना में अंश ही है ।

●    हर इकाई का गठन अनेक अंशों से सम्पन्न है ।

●    विखण्डन पूर्वक एकसूत्रता की उपलब्धि सिद्घ नहीं है, क्योंकि क्रिया किसी गठन पर ही आधारित होती है । इसी आधार पर विखण्डन विधि में दाह (ताप या दु:ख) पाया जाता है यह दाह, ताप या दु:ख पुन: दूसरे के लिये विखण्डन क्रिया के लिए कारक बन जाता है ।

●    विखण्डन क्रिया से किसी का अस्तित्व मिटाया नहीं जा सकता है, क्योंकि गणितश: इकाई का विखण्डन करते-करते भी कुछ शेष रह ही जाता है । मानव परम्परा में विखण्डन को समुदायों के रूप में पहचाना जाता है और अखण्डता में एक सूत्रता पूर्वक सम्पूर्ण मानव एक इकाई के रूप में पहचान में आता है।

●    मानव लौकिक एवम् पारलौकिक भेद से व्यवहार करता है ।

●    समस्त लौकिक व्यवहार स्वार्थ या परार्थ भेद से है तथा पारलौकिक व्यवहार सबीज और निर्बीज भेद से हैं ।

●    नैतिक एवम् अनैतिक भेद से स्वार्थ वादी व्यवहार है । इसका सम्बन्ध स्वजन, स्ववर्ग, स्वजाति, स्वमन, स्वसम्प्रदाय, स्वपक्ष तथा स्वभाषा भेद से है, जबकि परमार्थ व्यवहार सर्व-जन, सर्व-वर्ग, सर्व-जाति, सर्व-मन, सर्व-सम्प्रदाय, सर्व-पक्ष तथा सर्व-भाषा भेद का समाधान है ।

●    स्वार्थ (प्रलोभन) अर्थ व काम के भेद से है ।

●    परार्थ व्यवहार धर्म और अर्थ के भेद से है ।

●    परमार्थ विचार एवम् व्यवहार धर्म तथा मोक्ष के भेद से है ।

●    मानवीयता के लिये आवश्यकीय नियमपूर्वक किये गये समस्त राज्यनीति एवम् धर्मनीति सम्मत व्यवहार को ‘नैतिक’ तथा भ्रमवश अमानवीयता पूर्वक किये गये व्यवहार को ‘अनैतिक’ की  संज्ञा है ।

●    स्वजन, वस्तु व सेवा को महत्वपूर्ण और अन्य को गौण समझने वाली प्रवृत्ति की स्वार्थ संज्ञा है । इसी प्रकार परजन, वस्तु व सेवा में अधिक महत्व का अनुमान करने वाली प्रवृत्ति व प्रयास को परार्थ की संज्ञा दी जाती है ।

●    विषय चतुष्टय विचार ही सबीज विचार है । लोकेषणा और ऐषणामुक्ति निर्बीज विचार है । मानव पद में पुत्रेषणा और वित्तेषणा सबीज होते हुए मानव न्याय सम्मत समाधान सम्पन्न होता है । इसलिए ‘मानव’ भ्रमबाधा से मुक्त होता है तथा जागृत रहता है । जागृति पूर्ण होना शेष रहता है । मानव पद को भ्रान्ताभ्रान्त भी संज्ञा है । मानव पद में सबीज विचार का समीक्षा हुआ रहता है ।

●    समझदारी पूर्वक विचार अर्थात् ज्ञान, विज्ञान, विवेक प्रमाणित होना ही निर्बीज विचार है। यह दिव्य मानव कोटि में ही प्रमाणित होता है ।

●    व्यष्टि के अस्तित्व में पाया जाने वाला अभिमान व अहंकार ही संकीर्णता व क्लेश का मूल कारण है।

●    समष्टि के अस्तित्व की यथार्थ समझ से उदारता एवम् कृतज्ञता की उपलब्धि होती है और व्यापक सत्ता में अनुभूति से भ्रान्ति का उन्मूलन होता है ।

●    यथार्थ दर्शन के बिना मानवीय विचार, मानवीय विचार के बिना मानवीय कार्य-व्यवहार में प्रवृत्ति, मानवीय कार्य-व्यवहार के बिना व्यवहार की एकसूत्रता, व्यवहार की एकसूत्रता के बिना निर्विरोधिता, निर्विरोधिता के बिना निर्विरोधिता पूर्ण समाज, निर्विरोधता पूर्ण समाज के बिना सह-अस्तित्व, सह-अस्तित्व के बिना समाधान समृद्घि, समाधान समृद्घि के बिना स्वर्गीयता, स्वर्गीयता के बिना विवेक व विज्ञान पूर्ण अध्ययन, विवेक व विज्ञानपूर्ण अध्ययन के बिना यथार्थ दर्शन का प्रमाण नहीं है ।

‘‘सर्व शुभ हो”

Madhyasth Darshan