मानव जाति, मानव धर्म

 

मानव धर्म के बारे में, तीन आशय समाहित हैं| विकसित चेतना में जीता हुआ मानव, देव मानव, दिव्य मानव का अध्ययन है | चेतना के सन्दर्भ में चार भाग में अध्ययन है,  जीव चेतना, मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना |

जीव चेतना विधि से सम्पूर्ण अपराध मानव कर्ता हुआ देखने को मिला, उसका गवाही शिक्षा में लाभोन्माद, भोगोन्माद, कामोन्माद का होना है  | हर देश काल में हर अभिभावक अपने संतान को सुशील देखना चाहता है | उक्त प्रकार के तीनो उन्माद का शिक्षा देते हुए सुशील रहना कितना संभव है? हर अभिभावक सोच सकते है|

विकसित चेतना के प्रमाण में यही आचरण में पाया जाता है कि समाधान, समृद्धी, अभय, सहअस्तित्व ही सहज प्रमाण है | सहअस्तित्व में अनुभव का यह प्रमाण है| सहअस्तित्व अध्ययनगम्य हो चुकी है| ऐसे सहअस्तित्व में अनुभव मूलक विधि से सोचा गया विचारों का प्रमाण, नियम-नियंत्रण-संतुलन; न्याय-धर्म-सत्य रूप में व्यवहार में प्रमाणित होता है|

अनुभव मूलक विचार शैली सम्मत व्यवहार में स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष, दयापूर्ण कार्य व्यवहार के रूप में प्रमाणित होता हैं| इसे जीके, प्रमाणित करके देखा है| जिसका प्रयोजन अखण्ड समाज-सार्वभौम व्यवस्था है| इसके लिए ऊपर कहे गए आचरण विधि से वर्तमान में विश्वास होना होता है, फलस्वरुप अखण्ड समाज होता है| अखण्ड समाज व्यवस्था ही ‘१० सोपनीय विधि’ से परिवार सभा मूलक व्यवस्था होता है| यही सार्वभौम व्यवस्था है| यही विकसित चेतना का फल परिणाम है जिसमे हर व्यक्ति का भागीदारी होना होता है|

  • व्यक्ति में समाधान
  • परिवार में समाधान, समृद्धी
  • समाज में अखण्डता
  • व्यवस्था में सार्वभौमता

सहज प्रमाण ही भ्रम मुक्त, अपराध मुक्त मानव का स्वरुप है| इस प्रकार के मानव तैयार होना ही, अथवा नर नारी तैयार होना ही अपराध मुक्त, भ्रम मुक्त मानव जाति का पहचान है|

मानव जाति एक होने के मूल में काले, भूरे, गोरे और विभिन्न नस्ल समेत पाए जाने वाले मानव जात में खून के प्रजातियों का समानता के आधार पर, शरीर रचना में समाहित हड्डियों के आधार पर, अंग और अवयवों के आधार पर एक होना, इन सबका संयुक्त रूप में नाखून, दांत, के बनावट तीखे होना, खून के प्रजातियां निश्चित होना और आतों में मांसाहारी जात के जीवों का आंते छोटे होना, शाकाहारी जीवों के आंते लंबी होना, इन्ही आधारों पर मानव जाति एक होना अध्ययनगम्य हो चुकी है|

मानव सुख धर्मी है, समाधान ही मानव धर्म है| समाधान समझदारी से होता है, समाधान से ही मानव सुख का अनुभव करता है, यही मानव धर्म है| यह अध्ययनगम्य हो चुकी है| छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग इसे अध्ययन कर रहा है|

इस प्रकार शरीर रचना के आधार पर मानव जाति एक है एवं समाधान (समझदारी) के आधार पर मानव धर्म (सुख) एक है |

इसी के आधार पर मानव जाति एक, धर्म एक होने का प्रतिपादन २३ अप्रैल २०१२ को होगा | मानव जाति  एक, धर्म एक होने के आधार पर अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के अर्थ में ‘मानव मंदिर’ का स्थापना  ग्राम करौली, कानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ है|

जय हो! मंगल हो! कल्याण हो !

ए. नागराज

                                          प्रणेता – मध्यस्थ दर्शन, सह-अस्तित्ववाद

अमरकंटक, जिला – अनूपपुर, म.प्र. भारत

०१ मार्च २०१२

Madhyasth Darshan