जीवन का स्वरूप

 

जीवन गठनपूर्ण परमाणु है, चैतन्य इकाई है | इसीलिए इसमें संज्ञानशीलता और संवेदनशीलता का होना पाया जाता है | यह प्राकृतिक विधि से होता है | इसे कोई बनाने वाला, बिगाड़ने वाला है, ये झंझट रहा ही है | इसे लेकर अनेकों मान्यताएं प्रचलित है ही | इसी आधार पर मनुष्य सोचता है, हम भी बना सकते है, बिगाड़ सकते है | यही आधुनिक विज्ञान का मूल आधार है | बना सकने, बिगाड़ सकने के झंझट में पड़ने के कारण काफी कुंठाएं आचुकी है | हर स्तर पर विरोध है | कुछ देश कहते है हम एटम बम बना सकते है, कुछ नहीं बना सकते है, इसलिए ये समानता का कोई अर्थ ही नहीं हुआ, क्योंकि समानता अस्तित्व सहजता में है | अस्तित्व जो है सह अस्तित्व सहज है | असहजता से हम कुछ भी करते हैं, कहीं न कहीं उसका विरोध होता ही है |  उसके फल परिणाम भी विरोधाभासी होते हैं | जैसे व्यापार, वह इसी कारण लाभोन्मादी हो गया और इस कारण ज्यादा-कम वाला पिशाच पीछे पड गया | एक आदमी सोचता है कम है, दूसरा आदमी सोचता है ज्यादा है और झगडा बना ही रहता है | इस तरह किसी भी मनुष्य का स्वस्थ रूप में सुखी होकर कहीं जीना बना नहीं | हर कोई इसी अव्यवस्था का शिकार हो गया है | इसलिए स्वस्थ रूप में जीने के लिए हर मनुष्य को मूल्य और मूल्यांकन विधि से जीना होगा | उसका पहला चरण समझदारी, दूसरा चरण है इमानदारी, तीसरा चरण है जिम्मेदारी, चौथा चरण है भागीदारी | इन चार चरणों में मानव को अपनी समझदारी को प्रमाणित करना है |

समझदारी के अर्थ में तीन चीजें है, जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान | जीवन नित्य है, सुखाकाँक्षी है और सुख को मानव परंपरा में ही प्रमाणित कर सकता है | इसकेलिए प्रयत्न करने का पहला मुद्दा है जीवन को समझना, इसका नाम है “जीवन विद्या” | विद्या का धारक – वाहक जीवन है | विद्या के स्वरूप में तीन भाग होतें है | विद्या, विद्वता और विज्ञान | सम्पूर्ण अस्तित्व ही विद्या है, इस अस्तित्व में जीवन भी अविभाज्य है | जो भी समझदारी होती है, वह जीवन में ही होती है | यही विद्वता है | इसीलिए विद्वान मनुष्य ही होता है | इसीलिए सम्पूर्ण सह अस्तित्व रुपी अस्तित्व ही समझने कि वस्तु है | यही विद्या है |

इसे समझे बिना मानव तृप्त नहीं हो सकता क्योंकि सब कुछ को समझे बिना प्रश्न बने ही रहते हैं, ये प्रश्न मनुष्य को शान्ति से नहीं रहने देते, इनके उत्तर पाकर ही मनुष्य शांत होता है, फिर प्रमाणित करता है, यही तृप्ति है |

ए. नागराज 

Madhyasth Darshan